2 पूज्य पाद संतसेवी जी महाराज का परिचय। Brief introduction of Pujya Pad Santsevi Ji Maharaj - SatsangdhyanGeeta

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2 पूज्य पाद संतसेवी जी महाराज का परिचय। Brief introduction of Pujya Pad Santsevi Ji Maharaj

पूज्यपाद संतसेवी जी महाराज एक परिचय

प्रभु प्रेमियों ! सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के सानिध्य में रहने वाले संत पूज्यपाद संतसेवी जी महाराज की संक्षिप्त जीवनी एक आश्रम वासी ने लिखी है । उसी जीवनी को हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। यह कई भागों में है। इसका द्वितीय भाग यहां प्रकाशित किया जा रहा है। प्रथम भाग का पाठ करने के लिए।      यहां दवाएं।

2 पूज्य पाद संतसेवी जी महाराज का परिचय। Brief introduction of Pujya Pad Santsevi Ji Maharaj

Brief introduction of Pujya Pad Santsevi Ji Maharaj (भाग 2)

के लिये आपका विवाह कर देना चाहा । उन्होंने बार - बार आपसे विवाह के लिये आग्रह किया , पर कभी भी उन्हें आपकी सहमति न मिल सकी ।
     गार्हस्थ्य - जीवन व्यतीत करने की इच्छा आपके मन में कभी जाग्रत् ही न हुई । आप चाहते तो उस समय कोई - न - कोई सरकारी नौकरी आपको मिल ही जातो ; पर आप किसी बंधन में बँधकर रहना पसन्द नहीं करते थे । आप तो संसार में स्वतंत्र , स्वच्छन्दः होकर रहना चाहते थे । घर पर रहकर घर का अन्न खाना भी आपको उचित नहीं जच्चा । अतएव पारिवा रिक ममत्व से निःसंग होने और स्वावलम्बी जीवन बिताने के उद्देश्य से आपने सन १ ९ ३८ ई ० में घर छोड़ दिया 

    अपने घर से ४ मील की दूरी पर स्थित राजपुर गाँव में श्री लक्ष्मीकांत झा जी के घर पर उनके बच्चों तथा गाँव के अन्य लड़कों को भी खानगी तौर पर पढ़ाने लगे । अतिरिक्त समय में आप पूजापाठ एवं आध्यात्मिक पुस्तकों का अनुशीलन करते । आप अपने समय का दुरुपयोग करना नहीं चाहते थे । श्री झा के यहाँ बहुत सी अच्छी - अच्छी धार्मिक पुस्तके थीं । आपको पढ़ने का अच्छा अवसर मिल गया । उस समय समाज में शिक्षा की बड़ी कमी थी । पढे - लिखे लोग बहुत कम होते थे । जो मिडल भी पास कर लेता था , इलाके में उसकी बड़ी इज्जत होती थी और पढ़े - लिखे लोगों में गिनती होने लगती थी । श्री झा आपको बड़े आदर के साथ रखते थे । एक ही स्थान पर बहुत दिनों तक अध्यापन कार्य करते हुए आपको नीरसता का अनुभव होने लगा । अत : पूरे एक साल तक राजपुर में पढ़ाने के बाद आप सन् १ ९ ३६ ई ० में सदाबाद ( पूर्णियाँ ) चले आये । यहाँ भी आप अध्यापन - कार्य ही करने लगे ।

 गुरुदेव के प्रथम दर्शन एवं उनका शिष्यत्व - ग्रहण

 सन १६३६ ई ० के मार्च महीने में सैदाबाद से कुछ दूर कदखुदिया गाँव में बाबा श्री लच्छन दास जी ने मास - ध्यान का कार्यक्रम रखा था ।  इसमें महर्षि जी भी सम्मिलित थे । संदाबाद के कुछ सत्संगी लोग इस कार्यक्रम में भाग लेने आ रहे थे । जब आपने कनखुदिया में महर्षि जी के आने की खबर उनलोगों से सुनी, तो आपकी भी प्रबल इच्छा उनके दर्शन की हो गई ।आपने महर्षि जी का नाम सुना तो था , पर कभी उनका साक्षात्कार नहीं हुआ था । आप सैदाबाद के सत्संगियों के साथ कनखुदिया आये । ज्योंही दर्शन के लिये व्याकुल आपकी आँखों ने महर्षि जी के भव्य , आकर्षक मुखमण्डल के दर्शन किये , त्योंही आपकी सारी भक्तिभावना उमड़कर उनके श्रीचरणों में सिमट गयी ; वे आपको चिरपरिचित - से लगे , ऐसा लगा , मानो वे जन्म - जन्मान्तर के आपके कोई अपने आदमी है। आप तो सिर्फ दर्शन करने के लिये आये थे , लेकिन यह क्या ! आप तो उनसे दीक्षा देने और सदा के लिये उनके साथ रह जाने की प्रार्थना करने लगे । महषि जी ने जब विह्वल हो रहे आपको गौर से देखा , तो फिर उनकी प्रसन्नता का क्या कहना , मानो श्रीरामकृष्ण परम हंसदेव जी को योग्य शिष्य नरेन्द्र ( स्वामी . विवेकानन्द ) मिल गया हो । उनकी अन्तर्भदिनी दृष्टि से आपकी अन्तःस्थित महान् संभावनाएँ कैसे छिप सकती थीं ! उन्हें तो आप - जैसे युवक की ही वर्षों से खोज थी , जो आगे चलकर उनकी लक्ष्यसिद्धि में , धर्म - प्रचार में सक्रिय सहयोग कर सके । उनके निकट आने के लिये ही तो आप अज्ञात रूप से प्रेरित होकर सैदाबाद आये और वहाँ महर्षि जी का नाम सुनकर उनके दर्शन की व्याकुलता, अब क्या था ? : आपने महर्षि जी के हृदय में उसी दिन से एक विशेष स्थान अपने लिये बना लिया । गुरु ने योग्य शिष्य को २६ मार्च ; सन् १ ९ ३६ ई ० को सन्तमत - साधना ( मानस जप , मानस ध्यान और दृष्टियोग ) की दीक्षा देकर बड़ी आत्मतुष्टि का बोध किया । चकोर को पूर्ण चन्द्र - दर्शन से और चातक को स्वातिबूद की प्राप्ति से जो प्रसन्नता होती है , वही प्रसन्नता आपको महर्षि के दर्शन एवं दीक्षा - प्राप्ति से हुई । सदा के लिये अब दोनों अटूट प्रेम - सूत्र में बँध गये । 

गम्भीर साधना एवं यदा - कदा गुरुदेव की साहचर्य - प्राप्ति
 
जिस तरह सीपी स्वाति नक्षत्र की जल - बूंद लेकर तुरत सागर की अतल गहराई में चली जाती है और उससे मोती बनाने में लग जाती है , ' उसी तरह आप भजन - भेद लेकर उसी दिन से साधना में लीन रहने लगे । पूर्वजन्म के संस्कारवश ध्यानाभ्यास में आपका मन अधिकाधिक लगने जबतक कनखुदिया में मास - ध्यान - साधना चलती रही , तबतक आपने भी उसमें भाग लिया । मास - ध्यान समाप्त होने पर महर्षि जी ने उस क्षेत्र में कई दिनों तक घूम - घूमकर सत्संग - प्रचार किया । आपको भी उन्होंने साथ ले लिया था । सत्संग में आपसे ग्रन्थपाठ करवाते । आपके कण्ठ का माधुर्यपूर्ण स्वर सुनकर वे अतीव प्रमुदित हुए । सत्संग प्रचार में घूमते हुए महर्षि जी अपने रसोइये से बार - बार कहा करते , " देखो , वह जो एक नया युवक मेरे साथ आया है , उसे बुलाकर खिला दिया करो"। उस क्षेत्र का सत्संग - प्रचार समाप्त हुआ , तो महर्षि जी ने आपसे कहा- “ अब तुम अपने काम पर चले जाओ । " पहले आपको विश्वास हो गया था कि अब महर्षि जी आपको अपने साथ रख लेंगे । लेकिन यह क्या ! आशा पर तुषारापात ! आपने उनसे प्रार्थना की , " अब मैं आपके साथ रहने के सिवा और कुछ नहीं चाहता , कृपया मुझे निराश न करें । " लेकिन अभी साथ रहने का अवसर नहीं आया था । दुनिया में हर काम के होने का समय जो निश्चित है । नहीं रखने का कोई कारण था , जिसे महर्षि जानते थे और जिसे उन्होंने बाद में प्रकट भी कर दिया था । महर्षि जी ने विवशता का अनुभव करते हुए आपसे कहा , " अभी जो काम आप करते हैं , कीजिये , आवश्यकता होगी तो बुला लूगा । " गुरुदेव का आदेश था , क्या किया जाय ! बड़ी मुश्किल से आपने अपनी भावना को दबाया और श्रीचरणों में सिर टेककर निराश हृदय से अश्रुमुख हो सैदाबाद लौट आये । सैदाबाद में आप लगभग दो वर्षों तक रहे । 
    महर्षि जी अधीरता से उन दिनों की प्रतीक्षा कर रहे थे , जब आप उनके साथ अहर्निश रहते । आपका ख्याल सदा उनकी ओर लगा रहता था । क्यों न हो ? आपकी सुरत - रूपी डोरी जो उनके श्रीचरणों से बँध गयी थी । महर्षि जी भी आपको याद करते रहते थे । उनको जब कोई आवश्यकता होती या आपको देखने की इच्छा होती तो आपको खबर भिजवाकर बुला लेते और जहाँ - जहाँ - सत्संग - प्रचार में जाते , आपको भी साथ ले जाते । कुछ दिनों तक साथ रखकर पुन : जहाँ आप अध्या वन - कार्य करते , वहाँ लौट जाने कहते । सदैव साथ रहने के पूर्व तक आप कई बार उनके पास आये और कुछ दिनों तक ठहरकर चले गये ।

सत्संग - योग के सम्पादन में सहयोग
      सन् १ ९ ४० ई ० में महर्षि जी ने ' सत्संग - योग ' की पाण्डुलिपि तैयार करवाने के लिये बाबा श्री लच्छनदास जी द्वारा खबर भिजवाकर आपको बुलाया। उस समय उनका भांगलपुर जिले में सत्संग का कार्यक्रम चल रहा था । आप उनके साथ - साथ रहकर उनके निर्देशा नुसार ' सत्संग - योग ' के लिये सामग्री जुटाते । महर्षि जी लाल पेंसिल से किसी ग्रन्थ के अभीष्ट अंश को चिह्नित कर देते और आप उसे सादी पुस्तिका में उद्धत कर लेते । गुरु ग्रन्थ साहब से कुछ वाणियाँ उद्धत करने के लिये महर्षि जी ने आपको गुरुमुखी लिपि सिखायी ।गुरुमुखी लिपि सीखकर आपने उक्त ग्रन्थ से महर्षि के द्वारा बताये हुए पदों को देवनागरी लिपि में लिखा , जो ‘ सत्संग - योग ' के दूसरे भाग में संकलित है ।

 गुरुदेव का असीम वात्सल्य

      इसी क्रम में बभनगामा ( वाराहाट ) के एक सत्संग में वहीं के एक वयोवृद्ध सत्संगी श्रीचरण परिहथ जी ने महर्षि जी से आपके लिये प्रार्थना की , " सरकार ! - इनकी कण्ठ - ध्वनि बड़ी मधुर है , सन्तवाणी आदि का भी अच्छा पाठ करते हैं , इनको साथ रख लिया जाता तो बड़ा अच्छा आपको  

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2 पूज्य पाद संतसेवी जी महाराज का परिचय। Brief introduction of Pujya Pad Santsevi Ji Maharaj


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