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पूज्य पाद लाल दास जी महाराज का संक्षिप्त परिचय।Brief introduction of Pujya Padal Lal Das Ji Maharaj.

               ॥ ० ॥ ४ श्रीसद्गुरवे नमः ॥ ० ॥

पूज्यपाद बाबा श्री लालदास जी महाराज"का संक्षिप्त जीवनवृत्त 

मनोहर झांकी

. . . सुगठित छरहरा गौर वदन , अद्भुत तेजोवलय विकीर्ण करता हुआ मुखमण्डल , रामकृष्ण - सा मृण्डित शिर - श्मश्रु , शून्य में कुछ ढूढ़ते हुए से सुदीप्त नेत्रों पर उपनेत्र , सफेद गंजी - कुरता ; पहने हुए और २०वीं शताब्दी के महान् सन्त ९९ वर्षीय पूज्यपाद अनन्त श्री - विभूषित  महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के साथ में लाठी लिए हुए ये ही हैं ३२ वर्षीय पूज्य बाबा श्री लाल दास जी महाराज , जो महर्षि के अन्तरंग सहयोगी सेवक शिष्य हैं और जिन्हें २२ वर्षों की युवावस्था से ही छाया की भाँति उनके साहचर्यः का सौभाग्य प्राप्त है ।

पूज्य पाद लाल दास जी महाराज का संक्षिप्त परिचय।Brief introduction of Pujya Padal Lal Das Ji Maharaj. पूज्य पाद लाल दास जी महाराज
पूज्यपाद लाल दास जी महाराज

संत परंपरा की महत्त्वपूर्ण दैन 


भारत में परम्परागत सतौं द्वारा समय - समय पर ऐसी - ऐसी महान् विभूतियों को उत्पन्न करता रहा है , जिन्होंने भारतीय अध्यात्मिक , १ . सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन को मूलतः झकझोरा है , उन्हें एक नयी चेतना से परिपूरित किया है और एक समूचित दिशा प्रदान की है । स्वामी विवेकानन्द , परम सन्त बाबा देवी साहब , अरविन्द घोष , राय बहादुर शालिग्राम , सन्त धरनी दास , सुभाषचन्द्र बोस , खुदीराम बोस , डॉ . राजेन्द्र प्रसाद , लाल बहादुर शास्त्री , डॉ० चतुभुज सहाय ; जयप्रकाश नारायण , महर्षि मेंही परमहंस जी महाराजं . आदि परंपरागत नर रत्न संतों  ने मानवता की कितनी सेवा की है , किसी से अविदित नहीं है । करुणा - विगलित हो स्वामी विवेकानन्द ने भौतिकवाद से जर्जरित पाश्चात्य देशों में वेदान्त की विजयिनी पताका फहराकर अपनी ज्ञान-ज्योति से सच्चे सुख - शान्ति का पथ - निर्देशित किया , यह किसे ज्ञात नहीं है ।
 पूज्य बाबा श्री लालदास जी महाराज इसी महत् कुल में जन्म लेकर आज महर्षि के अनमोल अध्यात्मिक ज्ञानप्रसाद को जन - जन के बीच बाँटते हुए उनकी आध्यात्मिकता , सामाजिकता एवं नैतिकता के स्तर को ऊँच करने में तत्पर हैं , सक्रिय हैं ।

 जन्म और बाल्यावस्था 

 बिहार राज्य के भागलपुर जिलान्तर्गत गंगा के उत्तरी तट पर परवत्ता थाने में राघोपुर नामक एक गाँव है , जो नवगछिया रेलवे स्टेशन से 5-6 किलोमीटर उत्तर - पश्चिम है । यह गाँव नवगछिया अनुमंडल में पड़ता है। यहाँ वर्षों से गंगोत्री कुलभूषण बाबू स्व. पांचु मंडल जी रहते आ रहे थे । ये अपनी खेती का काम करते थे और अपने घर पर ही रहते थे । ये और इनकी धर्मपत्नी स्व.
 पूर्णी देवी जी कुलगुरु से दीक्षा लेकर पूजा - पाठ करते थे । इनके दो पुत्र हुए और एक पुत्री , जिनके नाम क्रमश : इस प्रकार हैं - श्री उमेश प्रसाद मंडल जी, श्री छोटेलाल मंडल तथा पुत्री श्री     जी ।       देवी जो अभी पारिवारिक जीवन बिता रही हैं ।   श्री उमेश प्रसाद मंडल जी अमीन इंस्पेक्टर थे और सन्तमत के अनुयायी भी  थे । अब इनका शरीर नहीं है। महर्षि जी से ये भी दीक्षित थे । इनके तीन पुत्र और         पुत्रियाँ हैं । इनके बड़े पुत्र का नाम श्री अरुण प्र. मंडल है , जो अभी गृहस्थ जीवन बिता रहे हैं । मंझलें पुत्र का नाम श्री जितेन्द्र मंडल है। ये भी गृहस्थ जीवन बिता रहे हैं और छोटे पुत्र श्री त्रिभुवन मंडल है। ये भी गृहस्थ जीवन बिता रहे हैं। 

श्री उमेश प्रसाद मंडल जी के छोटेेे भाई ही पूज्य श्री लाल दास जी महाराज के नाम से विख्यात हो रहे हैं । पूज्य बाबा श्री लाल दास  जी महाराज का जन्म पितृगह राघोपुर मेंं ही 18 जनवरी , 1952 ई० को हुआ । भाइयों में सबसे छोटे होने के कारण आप माता - पिता और अपने से बड़े भाइयों के स्नेह - भाजन हुए । सब लोग अप पर ज्यादा ख्याल रखते थे कि आपकी सुख - सुबिधा में किसी प्रकार की कमी न आने पाए । बचपन से ही लोगों को आपकी अध्यात्मिक वृत्ति के दर्शन होने लगे थे । पढ़ने लिखने में बहुत तेज होने के कारण आपके स्कूल के विद्यार्थी जो उच्च कुलोत्पन्न थे वह इर्षा किया करते थे और आपके साथी-संगी आपसे बहुत से स्नेह करते थे। आप हमेशा अपने क्लास में फर्स्ट आते थे। मैट्रिक की परीक्षा भी आपने फर्स्ट क्लास फर्स्ट में पास की थी और उसके बाद टीचर ट्रेनिंग की भी परीक्षा पास की थी, लेकिन बैराग भावना होने के कारण आपने सरकारी नौकरी त्याग दी और गुरु की सेवा में हाजिर हो गए।

स्कूली शिक्षा

अपर प्राइमरी स्कूल की शिक्षा अपने अपने गाँव में ही प्राप्त की । अपनी गाँव के मिड्ल कूल में पढ़ने के लिये घर से प्रतिदिन आप जाया करते थे । सन् १९६९ ई० में अपने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की । बाल्यकाल से ही अप तीव्र बुद्धि के हैं । अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम स्थान ही प्राप्त करते रहे । हिन्दी और गणित की ओर आपकी विशेष रुचि थी । हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम होने के कारण आपकी हिन्दी भाषा आगे चल कर बड़ी अच्छी हो गयी । गणित-प्रेम ने आपको उचित ढंग से चिन्तन करने की शक्ति प्रदान की । सबसे कम रुचि आपको अँगरेजी भाषा में थी । आप अग्रज श्री उमेश प्रसाद मंडल जी की हस्तलिपी  बहुत ही सुन्दर थी। उनकी हस्तलिपि बड़ी अच्छी होती थी । आपने उनकी हस्त लिपि का अनुकरण करके अपनी भी लिखावट सुडौल और सुललित बना ली । शैशव काल से ही आपके गले की आवाज तीक्ष्ण , कोमल और माधुर्य पूर्ण है । लोग आपके गले से ही रामायण आदि का पाठ सुनना पसंद करते थे । 

जोवन की नश्वरता का बोध और दीक्षा

जब आप अपने घर पर रहकर पढ़ाई कर रहे थे, उसी समय अपने पड़ोसी के आपसी विवाद में एक व्यक्ति ने गड़ासे से उसका गला काट दिया । इसको देखकर आप बहुत ही दुखी और जीवन की नश्वरता का बारीकी से चिंतन करने लगे। आत्मीय जनों के असामयिक निधन देखकर आपको जीवन क्षणभंगुर प्रतीत होने लगा , संसार की नि : सारता आपको अखिों के सामने नग्न रूप में नृत्य करने लगी । अव विरक्ति की भावना रह - रहकर प्रबल होने लगी और परिवार का ममत्व त्याग करके किसी साधु - महात्मा की संगति में रहने की चाहना करने लगे । पढ़ाई - लिखाई की ओर से आपका मन उचट गया । वैराग्य भावना की जागृति , गृह - त्याग और अध्यापन कार्य आपकी विरक्ति - भावना को आपके बड़े भाई जी ने भाँप लिया । अतएव उन्होंने आपको माया - जाल में फंसाने लिए आपका विवाह कर देना चाहा । उन्होंने बार - बार आपसे विवाह के लिये आग्रह किया , पर कभी भी उन्हें आपकी सहमति न मिल सकी । गार्हस्थ्य - जीवन व्यतीत करने की इच्छा आपके मन में कभी जाग्रत्  न हुई । | आप चाहते तो  सरकारी नौकरी कर सकते थे ; पर आप किसी बंधन में बंधकर रहना पसन्द नहीं करते थे । आप तो संसार में स्वतंत्र , स्वच्छन्द होकर रहना चाहते थे । घर पर रहकर घर का अन्न खाना भी आपको उचित नहीं हुँचा । अतएव पारिवारिक ममत्व से नि : संग होने और स्वावलम्बी जीवन बिताने के उद्देश्य से आपने सन १९७४ ई० में घर छोड़ दिया और अपने घर से 10 किलोमीटर दूरी पर अवस्थिथित महर्षि् मेंहीं आश्रम, कुप्पाघाट भागलपुर में आ गए और सतगुरु महर्षि मेंही के चरणोंं में अपनााा जीवन समर्पित कर दिया। अभी उनकी आज्ञा का पालन करना ही आपका मुख कर्तव्य था। अतिरिक्त समय में आप पूजापाठ एवं आध्यात्मिक पुस्तकों का अनुशीलन करते । आप अपने समय का दुरुपयोग करना नहीं चाहते थे । गुरुदेव के आदेश सेआपने 1978 ईस्वी में आइ.ए प्रथम श्रेणी में पास की और 1980 ई. में  भागलपुर विश्वविद्यालय से बीए हिंदी सम्मान से उत्तीर्ण  हुए। m.a. की परीक्षा अति ध्यान और वैराग्य के  चलते अरुचि होने के कारण नहीं दिए।
गुरुदेव के प्रथम दर्शन में जैसे ही आपकी  आँखों ने महर्षि जी के भव्य , आकर्षक मुखमण्डल के दर्शन किये , त्योंही आपकी सारी भक्तिभावना उमड़कर उनके श्रीचरणों में सिमट गयी ; वे आपको चिरपरिचित - से लगनेे लगे, मानो वे जन्म - जन्मान्तर के आपके कोई अपने आदमी हों । आप तो सिर्फ दर्शन करने के लिये आये थे , लेकिन यह क्या ! . आप तो उनसे दीक्षा देने और सदा के लिये उनके साथ रह जाने की प्रार्थना करने लगे । महर्षि जी ने जब विह्वल हो रहे आपको गौर से देखा , तो फिर उनकी प्रसन्नता का क्या कहना , मानो श्रीरामकृष्ण परम हंसदेव जी को योग्य शिष्य नरेन्द्र ( स्वामी विवेकानन्द) मिल गया हो । उनकी अन्तर्भेदिनी दृष्टि से आपकी अन्तःस्थित महान् संभावनाएँ कैसे छिप सकती थीं ! उन्हें तो आप - जैसे  युवक की ही वर्षों से खोज थी , जो आगे चलकर उनकी लक्ष्यसिद्धि में , धर्म - प्रचार में सक्रिय सहयोग कर सके । उनके निकट आने के लिये ही तो आप अज्ञात रूप से प्रेरित होकर अपने घर से आये और वहाँ महर्षि जी का नाम सुनकर उनके दर्शन की व्याकुलता जगी । अब क्या था ?  आपने महर्षि जी के हृदय में उसी दिन से एक विशेष स्थान अपने लिये बना लिया । गुरु ने योग्य शिष्य को सन् १९६८ ई० को सन्तमत - साधना ( मानस जप , मानस ध्यान और दृष्टियोग ) की दीक्षा देकर बड़ी आत्मतुष्टि का बोध किया । चकोर को पूर्ण चन्द्र - दर्शन से और चातक को स्वातिबूद की प्राप्ति से जो प्रसन्नता होती हैं , वही प्रसन्नता आपको महर्षि के दर्शन एवं दीक्षा - प्राप्ति से हुई । सदा के लिये अब दोनों अटूट प्रेम - सूत्र में बंध गए।

वर्तमान निवास और सेवा 


1974 ईस्वी से ही शांति संदेश में शुद्धिकरण का कार्य करते रहे हैं। आप सरल हृदय मृदुल स्वभाव और उदार साधु हैं। शांति संदेश एवं अन्य प्रकाशित सद ग्रंथों की भाषा की शुद्धता के साथ-साथ आत्म शुद्धता के लिए स्वाबलंबन जीवन व्यतीत करते हुए सद्गुरु के श्री चरणों की सेवा एवं ध्यान में जीवन लगाए रहे हैं। वर्तमान में संत नगर बरारी में अपनी कुटिया बनाकर एकांतवास रहकर ध्यान सत्संग में संलग्न रहते हुए सत्संगियों के विशेष आग्रह पर यदा-कदा प्रचार कार्य भी करते हैं और बहुत सारी पुस्तकों का लेखन भी आपके द्वारा किया गया है जिसकी पूरी जानकारी आप निम्नलिखित लिंक से प्राप्त कर सकते हैं। लाल दास के साहित्य

पूज्य पाद लाल दास जी महाराज का संक्षिप्त परिचय।Brief introduction of Pujya Padal Lal Das Ji Maharaj. गुरुदेव के पास खड़े हुए लाल दास जी महाराज
गुरुदेव के पास खड़े हुए लाल दास जी महाराज

प्रभु प्रेमियों ! पूज्य पाद लाल दास जी महाराज के बारे में आप ने जाना कि ये कितने महान विभूति और जन्मजात साधु पुरुष थे। इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। 

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2018 ईस्वी में लाल दास जी महाराज

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पूज्य पाद लाल दास जी महाराज का संक्षिप्त परिचय।Brief introduction of Pujya Padal Lal Das Ji Maharaj. पूज्य पाद लाल दास जी महाराज का संक्षिप्त परिचय।Brief introduction of Pujya Padal Lal Das Ji Maharaj. Reviewed by सत्संग ध्यान on जून 13, 2019 Rating: 5

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