MS05 . श्रीगीता-योग-प्रकाश || गीता के सही तात्पर्य को समझाने और इसके सैकड़ों भ्रामक विचार निवारक पुस्तक - SatsangdhyanGeeta

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MS05 . श्रीगीता-योग-प्रकाश || गीता के सही तात्पर्य को समझाने और इसके सैकड़ों भ्रामक विचार निवारक पुस्तक

श्रीगीता-योग-प्रकाश

    प्रभु प्रेमियों ! 'श्रीगीता-योग-प्रकाश' सब श्लोकों के अर्थ वा उनकी टीकाओं की पुस्तिका नहीं है। गीता के सही तात्पर्य को समझने के लिए जो दृष्टिकोण चाहिए, वही इसमें दरसाया गया है।  गीता के बारे में फैले हुए सैकड़ों भ्रामक विचारों में से एक का भी निराकरण यदि आप सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज से चाहते हैं, तो इस पुस्तक को शुरू से अंत तक एक बार अवश्य पढ़ें। आइये हम आपको इस पुस्तक के बारे में बताते हैं--

     महर्षि मेँहीँ साहित्य सीरीज की चौथी पुस्तक  'विनय-पत्रिका-सार सटीक' के बारे में जानकारी के लिए 👉 यहां दबाए । 

श्रीगीता-योग-प्रकाश
श्रीगीता-योग-प्रकाश

गीता के सही तात्पर्य को समझाने और इसके सैकड़ों भ्रामक विचार निवारक पुस्तक  'श्रीगीता-योग-प्रकाश' की एक झलक 

       प्रभु प्रेमियों ! ' योग ' शब्द का अर्थ ' युक्त होना ' है । अर्जुन विषाद युक्त हुआ , इसी का वर्णन प्रथम अध्याय में है , इसीलिए उस अध्याय का नाम ' विषादयोग ' हुआ । जिस विषय का वर्णन करके श्रोता को उससे युक्त किया गया , उसको तत्संबंधी योग कहकर घोषित किया गया । अध्याय २ के श्लोक ४८ में कहा गया है - ' समत्वं योग उच्यते ' अर्थात् समता का ही नाम ' योग ' है । इससे स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ ' योग ' शब्द का अर्थ समता है । पुनः उसी अध्याय के श्लोक ५० में कहा गया है - ' योगः कर्मसु कौशलम् ' अर्थात् कर्म करने की कुशलता या चतुराई को योग कहते हैं । यहाँ ' योग ' शब्द उपर्युक्त अर्थों से भिन्न , एक तीसरे ही अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । अतएव गीता के तात्पर्य को अच्छी तरह समझने के लिए ' योग ' शब्द के भिन्न - भिन्न अर्थों को ध्यान में रखना चाहिए ।    गीता स्थितप्रज्ञता को सर्वोच्च योग्यता कहती है और उसकी प्राप्ति का मार्ग बतलाती है । स्थितप्रज्ञता , बिना समाधि के सम्भव नहीं है । इसीलिए गीता के सभी साधनों के लक्ष्य को समाधि कहना अयुक्त नहीं है । इन साधनों में समत्व - प्राप्ति को बहुत ही आवश्यक बतलाया गया है । समत्व - बुद्धि की तुलना में केवल कर्म बहुत तुच्छ है । ( गीता २ / ४ ९ ) इसलिए समतायुक्त होकर कर्म करने को कर्मयोग कहा गया है । यही ' योगः कर्मसु कौशलम् ' है । अर्थात् कर्म करने की कुशलता को योग कहते हैं । कर्म करने का कौशल यह है कि कर्म तो किया जाय ; परन्तु उसका बंधन न लगने पावे । यह समता पर निर्भर करता है । गीता न सांसारिक कर्तव्यों के करने से हटाती है और न कर्मबंधन में रखती है । समत्व - योग प्राप्त कर स्थितप्रज्ञ बन , कर्म करने की कुशलता या चतुराई में दृढ़ारूढ़ रह , कर्तव्य कर्मों के पालन करने का उपदेश गीता देती है ।  इतना महत्वपूर्ण ज्ञान देने वाली पुस्तक 'श्रीगीता-योग-प्रकाश' निम्न प्रकार से प्रकाशित है--


श्रीगीता-योग-प्रकाश 01
श्रीगीता-योग-प्रकाश 01

श्रीगीता-योग-प्रकाश 02
श्रीगीता-योग-प्रकाश 02

श्रीगीता-योग-प्रकाश 03
श्रीगीता-योग-प्रकाश 03

श्रीगीता-योग-प्रकाश 04
श्रीगीता-योग-प्रकाश 04

श्रीगीता-योग-प्रकाश 05
श्रीगीता-योग-प्रकाश 05

श्रीगीता-योग-प्रकाश 06
श्रीगीता-योग-प्रकाश 06

श्रीगीता-योग-प्रकाश 07
श्रीगीता-योग-प्रकाश 07

श्रीगीता-योग-प्रकाश 08
श्रीगीता-योग-प्रकाश 08

श्रीगीता-योग-प्रकाश 09
श्रीगीता-योग-प्रकाश 09

श्रीगीता-योग-प्रकाश 10
श्रीगीता-योग-प्रकाश10

श्रीगीता-योग-प्रकाश 11
श्रीगीता-योग-प्रकाश 1 1

श्रीगीता-योग-प्रकाश 12
श्रीगीता-योग-प्रकाश 12

अनुक्रमणिका

        अध्याय विषय 

प्रकाशकीय 

महर्षिजी का परिचय 

भूमिका 

१. अथ अर्जुन विषादयोग 

२. अथ सांख्ययोग 

३. अथ कर्मयोग 

४. अथ ज्ञानकर्म - संन्यासयोग 

५. अथ कर्म - संन्यासयोग 

७. अथ ज्ञान - विज्ञानयोग 

८. अथ अक्षर ब्रह्मयोग 

९ . अथ राजविद्या - राजगुह्ययोग 

१०. अथ विभूतियोग 

११. अथ विश्वरूपदर्शनयोग 

१२. अथ भक्तियोग 

१४. अथ गुणत्रयविभागयोग 

१५. अथ पुरुषोत्तमयोग 

१६. अथ देवासुर संपद्विभागयोग 

१७. अथ श्रद्धात्रय - विभागयोग 


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सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज द्वारा लिखित संपादित पुस्तक 'श्रीगीता-योग-प्रकाश' का त्रयोदश संस्करण प्रकाशित हो चुका हैं। इसी से इस पुस्तक के लोकप्रियता का बोध होता है। 

श्रीगीता-योग-प्रकाश
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गीता सार अर्थ सहित
गीता-सार

पूज्यपद लाल दास जी महाराज द्वारा लिखित और संपादित पुस्तक 'गीता-सार' भी पठनीय और संग्रहणीय है। 


     प्रभु प्रेमियों ! समाधि - साधन के लिए जिन योगों की आवश्यकता है , उन सबका समावेश गीता में है । गीताशास्त्र के ज्ञानयोग , ध्यानयोग , प्राणायामयोग , जपयोग , भक्तियोग , कर्मयोग आदि सभी योगों की भरपूर उपादेयता है । सब एक - दूसरे से सम्बद्ध हैं और इस तरह सम्बद्ध हैं , जैसे माला की मणिकाएँ । अब अगर कोई कहे कि अमुक योग के अभ्यास करने का युग नहीं है , तो मानना पड़ेगा कि उनकी यह कथनी गीतोपदेश के विरुद्ध है । अन्य कोई कहे तो कहे , मगर कहनेवाले यदि भारत के उत्तम पुरुषों में से कोई हों और भारत के अध्यात्म जगत् की सर्वोत्तम उपाधि से विभूषित हों यानी ' सन्त ' कहलाते हों , तो स्थिति और गम्भीर हो जाती है । ये सन्त यदि कहें कि ' मेरे जीवन में गीता ने जो - जो स्थान पाया है , उसका मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता हूँ । गीता का मुझपर अनन्त उपकार है । मेरा शरीर माँ के दूध पर जितना पला है , उससे कहीं अधिक मेरा हृदय व बुद्धि दोनों गीता से पोषित हुए हैं । मैं प्रायः गीता के ही वातावरण में रहता हूँ , गीता यानी मेरा प्राण तत्त्वा ' और फिर वे ही अगर कहें कि ' अब ध्यान योग अभ्यास करने का युग नहीं है , तो स्थिति गम्भीरतम हो जाती है । और यही विदित होता है कि देश का अमंगलकाल ही चला आया है ।        अत: गुरुदेव का यह पुस्तक आप लोग अवश्य खरीद कर इसका संपूर्ण अध्ययन करें और अपने को मोक्ष मार्ग पर अग्रसर कर अपना लोक- परलोक अवश्य सम्हारे।



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श्रीगीता-योग-प्रकाश
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     प्रभु प्रेमियों ! सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के सभी शास्त्र पैठणीय, माननीय एवं संग्रहण करने योग्य है. अतः इनकी पुस्तकों का एक सेट या एक-एक प्रति का आर्डर अवश्य ही करें।  इससे आपको मोक्ष पर्यंत चलने वाले ध्यान अभ्यास में सहयोग करने का भी पूण्य प्राप्त होता है और अपका ज्ञान स्कोर भी समृद्ध होता है। अगर आपको इस तरह का जानकारी पसंद है तो इस वेबसाइट का सदस्य बने और अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे उनको भी लाभ हो .  निम्न वीडियो में ऊपर लिखित बातें बताई गई हैं। 




सद्गुरु महर्षि मेँहीँ साहित्य सुमनावली


संतवाणी सटीक
संतवाणी सटीक
     MS06 . संतवाणी सटीक-  इसमें 31 सन्त- कवियों के चुने हुए पदों की व्याख्या महर्षिजी ने की है। इसका प्रथम प्रकाशन 1968 ई0 में हुआ था।    संतवाणी सटीक के विषय में सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज के निम्नलिखित उद्गार हैं- "गुरु महाराज ने दृढ़ता के साथ यह ज्ञान बतलाया कि सब संतों का एक ही मत है । मैंने सोचा कि यदि बहुत - से संतों की वाणियों का संग्रह किया जाए , तो उस संग्रह के पाठ से गुरु महाराज की उपर्युक्त बात की यथार्थता लोगों को उत्तमता से विदित हो जाएगी । इसी हेतु मैंने यत्र-तत्र से उनका संग्रह किया ।"  'संतवाणी का संग्रह हुआ , बड़ा अच्छा हुआ ; परन्तु इन वाणियों का अर्थ भी आप कर दें , तो और भी अच्छा हो । ' मुझको भी यह बात अच्छी लगी । सबका संग्रह कर एक पुस्तकाकार में छपवा दिया जाए कि लोग उस पुस्तक से विशेष लाभ उठावें ।"    संतों ने ज्ञान और योग - युक्त ईश्वर - भक्ति को अपनाया । ईश्वर के प्रति अपना प्रगाढ़ प्रेम अपनी वाणियों में दर्शाया है । उनकी यह प्रेमधारा ज्ञान से सुसंस्कृत तथा सुरत - शब्द के सरलतम योग - अभ्यास से बलवती होकर , प्रखर और प्रबल रूप से बढ़ती हुई अनुभूतियों और अनुभव से एकीभूत हो गई थी , जहाँ उन्हें ईश्वर का साक्षात्कार हुआ और परम मोक्ष प्राप्त हुआ था । उनकी वाणी उन्हीं गम्भीरतम अनुभूतियों और सर्वोच्च अनुभव को अभिव्यक्त करने की क्षमता से सम्पन्न और अधिकाधिक समर्थ है । ' संतवाणी सटीक ' में पाठकगण उसी विषय को पाठ कर जानेंगे ।    (  और जाने  )   

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MS05 . श्रीगीता-योग-प्रकाश || गीता के सही तात्पर्य को समझाने और इसके सैकड़ों भ्रामक विचार निवारक पुस्तक MS05 . श्रीगीता-योग-प्रकाश ||  गीता के सही तात्पर्य को समझाने और इसके सैकड़ों भ्रामक विचार निवारक पुस्तक Reviewed by सत्संग ध्यान on 11/10/2021 Rating: 5

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