G10 परमात्मा की बिशेष विभूति और अष्ट सिद्धिं ।। Shreemad Bhagavad Gita- 10th Chapter - SatsangdhyanGeeta

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G10 परमात्मा की बिशेष विभूति और अष्ट सिद्धिं ।। Shreemad Bhagavad Gita- 10th Chapter

श्रीगीता-योग-प्रकाश / 10

प्रभु प्रेमियों ! भारत ही नहीं, वरंच विश्व-विख्यात सुविख्यात श्रीमद्भागवत गीता भगवान श्री कृष्ण द्वारा गाया हुआ गीत है। इसमें 700 श्लोक हैं तथा सब मिलाकर 9456 शब्द हैं। इतने शब्दों की यह तेजस्विनी पुस्तिका भारत की आध्यात्म-विद्या की सबसे बड़ी देन है। संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "श्रीगीता-योग-प्रकाश" इसी पुस्तिका के बारे में फैले हुए सैकड़ों भ्रामक विचारों को दूर करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें सभी श्लोकों के अर्थ और उनकी टीका नहीं है। गीता के सही तात्पर्य को समझने के लिए जो दृष्टिकोण, साधनानुभूति-जन्य ज्ञान, संतवाणीी-सम्मत और गुरु ज्ञान से मेल खाते वचन चाहिए, वही इसमें दर्शाया गया है।

इसमें बताया गया है कि विभूति किसे कहते हैं ? अष्ट सिद्धियां कौन-कौन से हैं ? सिद्धियां क्या नुकसान पहुंचा सकती है? सिद्धियां किन में पायी जाती है? ज्ञान बुद्धि उड़ता क्षमा सत्य इत्यादि इन से उत्पन्न होता है? परमात्मा की विभूतियां किसे कहते हैं? अवतारी पुरुषों का शरीर कैसा होता है? परमात्मा संसार को किस तरह धारण किए हुए हैं? भगवान का शरीर कहां गया? ईश्वर की, परमात्मा की अलौकिक शक्तियां क्या है? परमात्मा की विभूति अर्थात अलौकिक शक्तियां कई प्रकार की है। जिसका वर्णन इस अध्याय में किया गया है और सभी तेजवानों को परमात्मा की विभूति माना गया है। इससे परमात्मा की महिमा का पता चलता है। इसमें यह भी बताया गया है कि जो परमात्मा को अनादि, अनंत रूप में जानता है। वह सब पापों से मुक्त हो जाता है   इसके साथ ही आप निम्नांकिचत सवालों के जवाबों में से भी कुछ-न-कुछ समाधान अवश्य पाएंगे। जैसे- सिद्धियों के विभिन्न प्रकार, अष्ट सिद्धि शाबर मंत्र, पंचभूत सिद्धि, वायु सिद्धि, नौ निधियों के नाम, 10 gaun siddhi, अणिमा का अर्थ, सिद्धियां कितनी मानी गई है, दस गौण सिद्धियां, हनुमान अष्ट सिद्धि मंत्र, नव निधियों के नाम, महिमा सिद्धि मंत्र, सिद्धि का मतलब, वशित्व सिद्धि मंत्र, अष्ट सिद्धि प्राप्ति मंत्र, आठ सिद्धियां, नौ निधियां, अष्ट सिद्धि नव निधि कैसे प्राप्त होती है, अष्ट सिद्धि नव निधि कैसे प्राप्त करें, आठ सिद्धियां कौन-कौन सी है, आठ सिद्धियां, नौ निधियां क्या है,, आदि बातें। इत्यादि बातें । इन बातों को समझने के पहले आइए गुरु महाराज के दर्शन करें।

इस अध्याय के पहले वाले अध्याय 9  को पढ़ने के लिए     यहां दबाएं।

अष्ट सिद्धि और परमात्मा की विभूति क्या है इस पर चिंतन करते हुए सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज

Secret of divine realization and attainment of the eight perfections

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज इस अध्याय में कहते हैं What is Vibhuti?  What are Ashta Siddhis?  What harm can siddhis do?  In whom are the Siddhis found?  Knowledge, wisdom, flying forgiveness, truth etc. arise from these?  What are the images of God?  What is the body of avatar men like?  How is God wearing the world?  Where did God's body go? आदि बातें । आइए उनकेे विचार पढ़ते हैं-



अध्याय 10

अथ विभूतियोग 

इस अध्याय का विषय “ विभूतियोग ' है । इसमें परमात्मा की विभूतियों का वर्णन किया गया है ।

     विभूति का अर्थ अलौकिक शक्ति है । इसकी अष्ट सिद्धियाँ [ ( १ ) अणिमा ( अदृश्य होने की शक्ति ) , ( २ ) महिमा ( अपने को बहुत बड़ा बना लेने की शक्ति ) , ( ३ ) गरिमा ( अपने को जितना भारी या वजनदार बनाना चाहें , उतना भारी बनाने की शक्ति ) , ( ४ ) लघिमा ( बहुत छोटा और बहुत हल्का बन जाने की शक्ति ) , ( ५ ) प्राप्ति ( सभी इच्छाओं को पूर्ण कर लेने की शक्ति ) , ( ६ ) प्राकाम्य ( स्वेच्छानुसार प्रचुरता - लाभ की शक्ति ) , ( ७ ) ईशित्व आधिपत्य प्राप्त कर लेने की शक्ति ) और ( ८ ) वशित्व ( अपने वश में कर लेने की शक्ति ) ] योगाभ्यास में प्राप्त होती हैं । परन्तु-- 

"रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई । बुद्धिहिं लोभ दिखावहिं आई । होइ बुद्धि जौं परम सयानी । तिन्ह तन चितब न अनहित जानी ॥" ( तुलसीकृत रामचरितमानस ) 

     ऋद्धि - सिद्धि की प्रेरणा से बुद्धि के सामने अनेक प्रलोभन आते रहते हैं ; परन्तु परम सयानी बुद्धि वही है , जो इन्हें अहितकर समझते हुए इनकी ओर जरा भी नजर उठाकर देखे तक नहीं । ये मायिक सिद्धियाँ अवतारी पुरुषों में स्वाभाविक होती हैं । अध्याय ७ , ८ और ९ में परमात्मा और उनकी भक्ति की महिमा बतलायी गई है । इसमें उसी प्रकार सब बतलाकर यह कहा गया है कि जो परमात्मा को अजन्मा और अनादि रूप में जानता है , वह सब पापों से छूट जाता है । 

     बुद्धि , ज्ञान , अमूढ़ता , क्षमा , सत्य , इन्द्रिय - निग्रह , शान्ति , सुख , दुःख , जन्म , मृत्यु , भय , अभय , अहिंसा , समता , सन्तोष , तप , दान , यश , अपयश आदि भाव , जो प्राणियों में उत्पन्न होते रहते हैं , वे सब - के - सब परमात्मा उत्पन्न होते हैं । सर्व चराचर में जो विशेष प्रभाववाले हैं , उन सबके सहित सारी सृष्टि का सृजन परमात्मा ने ही किया है । परमात्मा परब्रह्म , परधाम , परम पवित्र , अविनाशी , दिव्य पुरुष और आदिदेव हैं । वे स्वयं अपने को अपने से पहचानते हैं । परमात्मा की विभूतियों का सम्पूर्णतः वर्णन होना असम्भव है । उनका अल्पातिअल्प वर्णन इस प्रकार है कि प्राणियों की आत्मा , सब जीवों का आदि , मध्य और अन्त , ज्योतियों में सूर्य , रुद्रों में शंकर , विद्याओं में अध्यात्म - विद्या , वृष्णिकुल में वासुदेव और ज्ञानवान का ज्ञान इत्यादि जो कुछ भी विभूतिवान , लक्ष्मीवान या प्रभावशाली हैं , उनकी उत्पत्ति परमात्मा के तेजांश से ही समझनी चाहिए । परमात्मा की विभूतियाँ असंख्य हैं । उनके सम्पूर्ण विस्तार का वर्णन किया ही नहीं जा सकता है । वह अपने एक अंश - मात्र से इस सम्पूर्ण जगत् को धारण करके विद्यमान हैं । भगवान् श्रीकृष्ण के शुभ कथन का साररूप से यह आशय लिखा गया है ।

     इससे जानना चाहिए कि वृष्णिकुल में उत्पन्न नरतन - धारी तो वही थे । अपने को परमात्मभाव में जानते हुए अपने परम तेजस्वी नर - शरीर में अर्थात् साकार स्थूल - सगुण रूप में अपने ही को उन्होंने अपनी ' विभूति ' बतलायी है और अपने मंगलमय मानव - रूप को भी रखा है । इस परमात्मांश रूप को , सब प्राणियों के अन्दर की आत्मा को और भगवान् श्रीकृष्ण ने परमात्म - भाव में अपने को , गीता के बहुत स्थानों में तथा उसके इस अध्याय में भी अज - अविनाशी कहा है , सो सर्वथा उचित ही है । सारे जगत् को केवल एक ही अंश से धारण ( वा भरपूर ) करना बताकर परमात्म - स्वरूप की अनन्तता व्यक्त की गई है । विश्वरूप में वा देवरूप में वा अणु से भी अणु रूप में अनन्तस्वरूपी परमात्मा का सम्पूर्णत : अँटना वा समाकर रहना असम्भव है । इसीलिए वृष्णिकुल  में जन्मधारी वासुदेवरूप को भी उपर्युक्त एक अंश के अन्दर ही गीता में बताया गया है । यदि कोई कहे कि वृष्णिकुल में तो हलधर श्रीबलराम भगवान् भी वासुदेव थे , तो गीता में यह व्यक्त नहीं किया गया है । विशेष तेजवानों को ही परमात्मा की विभूतियों में गिनाया गया है । श्रीबलभद्र और श्रीकृष्ण में विशेष तेजवान तो श्रीकृष्ण ही थे । इसी से महातेजस्वी श्रीकृष्ण वासुदेव को परमात्मा के उपर्युक्त एक अंश में ही जानना अनुचित नहीं है । और महाभारत के स्वर्गारोहण पर्व , अध्याय ५ , श्लोक २४ में लिखा गया है कि 

"यः स नारायणो नाम देवदेवः सनातनः । तस्यांशो वासुदेवस्तु कर्मणाऽन्ते विवेश ह ॥" 

अर्थ - जो देवताओं के भी देवता - सनातन नारायण हैं , उनके अंशरूप वासुदेवजी कर्म के अन्त होने पर उसी में प्रविष्ट हो गये । 

दशम अध्याय समाप्त ॥ 

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प्रेमियों ! आप लोगों ने गुरु महाराज कृत "श्री गीता योग प्रकाश" के तीसरे अध्याय में जाना कि vibhooti kise kahate hain ? asht siddhiyaan kaun-kaun se hain ? siddhiyaan kya nukasaan pahuncha sakatee hai?  siddhiyaan kin mein paayee jaatee hai? gyaan buddhi udata kshama saty ityaadi in se utpann hota hai? paramaatma kee vibhootiyaan kise kahate hain? avataaree purushon ka shareer kaisa hota hai? paramaatma sansaar ko kis tarah dhaaran kie hue hain? bhagavaan ka shareer kahaan gaya? इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका याक्ष कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने  इससे आपको आने वाले पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। इस लेख का पाठ निम्न वीडियो में किया गया है । इसे अवश्य  देखें।



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G10 परमात्मा की बिशेष विभूति और अष्ट सिद्धिं ।। Shreemad Bhagavad Gita- 10th Chapter G10  परमात्मा की बिशेष विभूति और अष्ट सिद्धिं  ।। Shreemad Bhagavad Gita- 10th Chapter Reviewed by सत्संग ध्यान on 7/26/2018 Rating: 5

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