G11 ईश्वर का विराट रूप और परमात्म-दर्शन ।। Bhagavad Gita- 11th Chapter - SatsangdhyanGeeta

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G11 ईश्वर का विराट रूप और परमात्म-दर्शन ।। Bhagavad Gita- 11th Chapter

श्रीगीता-योग-प्रकाश / 11

प्रभु प्रेमियों ! भारत ही नहीं, वरंच विश्व-विख्यात सुविख्यात श्रीमद्भागवत गीता भगवान श्री कृष्ण द्वारा गाया हुआ गीत है। इसमें 700 श्लोक हैं तथा सब मिलाकर 9456 शब्द हैं। इतने शब्दों की यह तेजस्विनी पुस्तिका भारत की आध्यात्म-विद्या की सबसे बड़ी देन है। संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "श्रीगीता-योग-प्रकाश" इसी पुस्तिका के बारे में फैले हुए सैकड़ों भ्रामक विचारों को दूर करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें सभी श्लोकों के अर्थ और उनकी टीका नहीं है। गीता के सही तात्पर्य को समझने के लिए जो दृष्टिकोण, साधनानुभूति-जन्य ज्ञान, संतवाणीी-सम्मत और गुरु ज्ञान से मेल खाते वचन चाहिए, वही इसमें दर्शाया गया है।

इसमें बताया गया है कि भगवान श्री कृष्ण के विराट रूप का दर्शन कैसा था? भगवान ने अर्जुन को विश्वरूप का दर्शन क्यों कराया? भगवान का विश्वरूप कैसा था? विश्वरूप के दर्शन से क्या लाभ हुआ? भगवान को कोई किस तरह से पता है? क्या विश्वरूप आदि अंत सहित था? क्या विश्वरूप भगवान की माया था? असली परमात्म-दर्शन कहां होता है, जिससे सभी दुखों का नाश हो जाता है? विराट रूप का दर्शन ईश्वर के आत्मस्वरुप का दर्शन है या नहीं? क्या विराट रूप के दर्शन परमात्म दर्शन है? क्या विराट रूप के दर्शन से, 'परमात्म दर्शन से जो-जो सिद्धियां प्राप्त होती है, वे सारी सिद्धियां और फल अर्जुन को तथा संजय को प्राप्त हुआ था? परमात्म दर्शन और विराट रूप दर्शन का सही स्वरूप में यथार्थ रहस्य क्या है?  इसके साथ ही आप निम्नांकिचत सवालों के जवाबों में से भी कुछ-न-कुछ समाधान अवश्य पाएंगे। जैसेविराट स्वरूप स्तुति, श्री कृष्ण ने अर्जुन को विराट रूप दिखाया, विराट स्वरूप त्रिभुवन राया, शंकर भगवान का विराट रूप, हनुमान का विराट रूप, गीता के अनुसार ईश्वर का स्वरूप, विराट रूप मंत्र, गीता के अनुसार ईश्वर की परिभाषा, वेदों के अनुसार ईश्वर कौन है, महापुरुषों के अनमोल वचन,भारतीय संतो के विचार,संत लोगों के विचार,संत बचन, भक्ति, श्री कृष्ण ने उतंग मुणि को बिराट रूपप दिखाया, जब श्री कृष्ण अर्जुन और सुदामा को विराट रुप के दर्शन दिए, महाभारत विराट रुप दर्शन, परमात्मा की परिभाषा, परमात्मा का अर्थ, परमात्मा कहा है, परमात्मा meaning, परमात्मा एक, परमात्मा क्या है, परमात्मा कौन है, आत्मा और परमात्मा का दर्शन, परमात्मा राम, परमात्मा का नाम, परमात्मा की प्राप्ति, दि बातें। इन बातों को समझने के पहले आइए भगवान के विराट रूप के दर्शन करें।

इस अध्याय के पहले वाले अध्याय 10 को पढ़ने के लिए     यहां दबाएं।

Bhagwan Shri Krishna ka Virat roop Darshan

The great form and divine vision of God

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज इस अध्याय में कहते हैं How was the vision of the great form of Lord Shri Krishna?  Why did God make Arjuna see the world?  How was the world of God?  What was the benefit of Viswaroop's philosophy?  How does anyone know God?  Was Vishwaroop etc. with end?  Was Vishwaroopa Maya of God?  Where is the real God-Darshan, from which all sorrows are destroyed? आदि बातें । आइए उनकेे विचार पढ़ते हैं-


अध्याय 11

अथ विश्वरूप - दर्शनयोग

इस अध्याय का विषय ' विश्वरूप - दर्शनयोग ' है । 

     विश्वरूप का दर्शन पाने की प्रार्थना पांडव अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से की थी । उस विश्वरूप का दर्शन करनेयोग्य दिव्य दृष्टि अपने योगबल से अर्जुन को देकर तथा अपनी महिमा - विभूति को धारण कर , भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अभिलषित रूप का दर्शन दिया । वह रूप आश्चर्यमय था । अत्यन्त विशाल था , जिससे उसका ओर - छोर जाना नहीं जाता था । उसे अनन्त और सर्वव्यापी देव कहकर जनाया गया है । वह बड़ा प्रकाशमय था । हजारों सूर्य का एक साथ प्रकट प्रकाशपुंज भी उस महान प्रकाशमय तेज - सदृश कदाचित ही हो । देवादि सर्व प्राणी उस महान रूप में दिखाई पड़ते थे । उस रूप में हाथ , पैर , उदर , मुख और नेत्रादि सभी अवयव अनेकानेक दरसते थे । वह रूप मुकुटधारी , गदाधारी और चक्रधारी था । वह रूप इतना महाविकराल* 
था कि उसका दर्शन करके अर्जुन बहुत विस्मित , भयभीत और व्याकुल था । उस रूप के मुखों में बड़े - बड़े दाँत थे । विकराल दाढ़वाले भयानक मुखों में कौरव - पाण्डव के वीरगण उसी तरह प्रवेश करते देखे जाते थे , जिस तरह दीपक - टेम में फतिंगे वेग से जा - जाकर पड़ते हैं और जलकर विनाश को प्राप्त होते हैं । उन वीरों में से कितनों ही के सिर चूर होकर उस विश्वरूप के दाँतों के बीच में लगे हुए देखने में आते थे । ऐसा जान पड़ता था कि वह विश्वरूप सब लोगों को सब ओर से निगलकर अपने प्रज्वलित और भयानक मुख से उनका भक्षण कर रहा हो । यह भगवान श्रीकृष्ण का सर्वनाशक एवं बढ़ा हुआ कालरूप था । 

     आश्चर्यमय अति भयंकर काल - सदृश विश्वरूप भगवान ने अर्जुन को कहा- ' प्रत्येक सेना में जो ये सब योद्धा आए हुए हैं , उनमें से तेरे न लड़ने से भी कोई बचनेवाला नहीं है । इसलिए तू उठ खड़ा हो ; कीर्ति प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर राज्य भोग । इन्हें मैंने पहले ही मार रखा है ; तू केवल निमित्त - मात्र बन । तू मत डर ; युद्ध कर , शत्रुओं को तू रण में जीतने को है । ' अर्जुन ने उन भगवान को नमस्कार कर उनकी बहुत - सी स्तुतियाँ करके पुनः विशेष निवेदन किया - ' आप अक्षर , सत् - असत् , सत् - असत् से भी परे , आदिदेव , पुराण - पुरुष , जगत के पिता और गुरु हैं । आप परम धाम हैं , आपको आगे - पीछे तथा सब ओर से बारम्बार साष्टांग प्रणाम करता हूँ । आपके इस उग्र रूप के दर्शन से मैं भयभीत और व्याकुल हूँ । मुझको क्षमा कीजिए और अपने पहले के चतुर्भुजी सौम्य रूप का ही पुनः दर्शन दीजिए । अर्जुन की अनुनय - विनययुक्त स्तुतियों को सुनकर विराट रूप भगवान ने कहा - ' इस रूप का दर्शन तुझको केवल अनन्य भक्त जानकर दिया है । यह दर्शन तेरे अतिरिक्त और किसी को पहले नहीं हुआ है । यह वेदाभ्यास , यज्ञ , शास्त्रों के अध्ययन तथा दान से किसी को नहीं मिल सकता है । तू घबड़ा मत । ' वासुदेव ने ऐसा कह अपना पूर्व परिचित रूप अर्जुन को फिर दिखाया और कहा- ' हे पाण्डव ! जो सब कर्म मुझे समर्पित करता है , मुझमें परायण रहता है , मेरे भक्त बनता है , आसक्ति का त्याग करता है और प्राणिमात्र से द्वेष - रहित होकर रहता है , वह मुझे पाता है ।

     विचारना चाहिए कि विश्वरूप आदि - अन्त - रहित कभी नहीं हो सकता ; क्योंकि विश्व की व्यापकता तक ही होने के कारण वह विश्वरूप कहलाता है । विश्व वा संसार आदि - अन्त - सहित माननेयोग्य है । और अवयवयुक्त रूप में अवयवों के भिन्न - भिन्न होने के ज्ञान के लिए अवश्य ही कुछ - न - कुछ शून्य चाहिए । यह शून्य तथा अलग से खड़े होकर अर्जुन ने विश्वरूप का दर्शन कर जो स्तुति और निवेदन किया था , इसमें अर्जुन और विराट रूप भगवान के बीच का शून्य और जिधर - जिधर से योद्धा लोग उन भगवान के विकराल मुख में घुसते और मर - मरकर गिरते थे , उधर - उधर के रिक्त स्थान का शून्य , ये सब शून्य परमात्मा के आदि - अन्त - रहित वा असीम स्वरूप को नहीं दरसाते हैं । अतएव विराट रूप भगवान के इस दर्शन को परमात्म - स्वरूप का दर्शन कैसे माना जाय ? 

     अध्याय ९ में दरसा आया हूँ कि यह विश्वरूप भी भगवान की माया ही था । अर्जुन को भगवान से दी गई दिव्य दृष्टि परमात्म - दर्शन की आत्मरूप - दृष्टि नहीं थी , दिव्य माया के दर्शन करने की ही दृष्टि थी । न अर्जुन उस समय तुरीयावस्था में रहते हुए समाधि में थे और न संजय ने ही समाधि में रहकर विराट भगवान और अर्जुन को उस समय देखा था और न उनके कथोपकथन को सूना था । अर्जुन और संजय , दोनों ही उस समय जाग्रतावस्था में थे । परमात्म - दर्शन जाग्रत , स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में नहीं , बल्कि तुरीयावस्था के आरम्भ में भी नहीं ; वरन् अन्त में होता है । परमात्मा के विश्वरूप को उनका मायिक रूप न मानकर उसी को उनका क्षराक्षर - पर , परमाक्षर - पुरुषोत्तम स्वरूप मान लेना यथार्थ और विचारयुक्त नहीं है ।

 ॥ एकादश अध्याय समाप्त ॥

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* ऐसा परमात्म - स्वरूप निर्मायिक है , त्रयगुणमयी प्रकृति से निर्मित नहीं है । अतः उसको ' विकराल ' नहीं कह सकते । उसका दर्शन शरीरयुक्त रहने से नहीं होता हैं , केवल आत्मा को ही होता है । परमात्मदर्शी आत्मा को उस दर्शन से वैसा डर नहीं होता , जैसा कि अर्जुन को विराट रूप - दर्शन से हुआ था । अत : विराट रूप का दर्शन मायिक रूप का दर्शन है । 

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Meditation image in santmat


इस अध्याय के बाद वाले अध्याय 12 को पढ़ने के  लिए    यहां दबाएं


प्रेमियों ! आप लोगों ने गुरु महाराज कृत "श्री गीता योग प्रकाश" के तीसरे अध्याय में जाना कि bhagavaan shree krshn ke viraat roop ka darshan kaisa tha? bhagavaan ne arjun ko vishvaroop ka darshan kyon karaaya? bhagavaan ka vishvaroop kaisa tha? vishvaroop ke darshan se kya laabh hua? bhagavaan ko koee kis tarah se pata hai? kya vishvaroop aadi ant sahit tha? kya vishvaroop bhagavaan kee maaya tha? asalee paramaatm-darshan kahaan hota hai, jisase sabhee dukhon ka naash ho jaata hai? इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका याक्ष कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने  इससे आपको आने वाले पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। इस लेख का पाठ निम्न वीडियो में किया गया है । इसे अवश्य  देखें।



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G11 ईश्वर का विराट रूप और परमात्म-दर्शन ।। Bhagavad Gita- 11th Chapter G11  ईश्वर का विराट रूप और परमात्म-दर्शन ।। Bhagavad Gita- 11th Chapter Reviewed by सत्संग ध्यान on 8/01/2018 Rating: 5

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