G13, भगवान कृष्ण के अनुसार Shareer aur shareeree kya । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभागयोग । -महर्षि मेंहीं - SatsangdhyanGeeta

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G13, भगवान कृष्ण के अनुसार Shareer aur shareeree kya । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभागयोग । -महर्षि मेंहीं

श्रीगीता-योग-प्रकाश अध्याय 13 

प्रभु प्रेमियों ! भारत ही नहीं, वरंच विश्व-विख्यात श्रीमद्भागवत गीता भगवान श्री कृष्ण द्वारा गाया हुआ गीत है। इसमें 700 श्लोक हैं तथा सब मिलाकर 9456 शब्द हैं। इतने शब्दों की यह तेजस्विनी पुस्तिका भारत की आध्यात्म-विद्या की सबसे बड़ी देन है। संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "श्रीगीता-योग-प्रकाश" इसी पुस्तिका के बारे में फैले हुए सैकड़ों भ्रामक विचारों को दूर करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें सभी श्लोकों के अर्थ और उनकी टीका नहीं है। गीता के सही तात्पर्य को समझने के लिए जो दृष्टिकोण, साधनानुभूति-जन्य ज्ञान, संतवाणीी-सम्मत और गुरु ज्ञान से मेल खाते वचन चाहिए, वही इसमें दर्शाया गया है।

इस अध्याय में बताया गया है कि-  शरीर ( क्षेत्र ) और शरीरी ( क्षेत्रज्ञ ) अर्थात् देह और देही को यथार्थतः भिन्न - भिन्न कर जानें - दोनों को एक ही न समझ बैंठें और न यह समझ कि देही देह ही है और न ऐसी भूल करें कि देह में देह से भिन्न कुछ अन्य पदार्थ ( देही या चेतन जीव ) है ही नहीं ; तथा लोगों की सुनिश्चित रूप से यह भी पूर्णतया विदित हो जाया कि स्वयं परमात्मा की विशेषावतार के शरीर ( क्षेत्र ) में उस व्यक्त दिव्य श्रीविग्रहरूप से भिन्न , अद्भुत और अव्यक्त हैं । क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ का विभाग करके उनके स्वरूपों का पृथक - पृथक वर्णन, आदि बातें।  इन बातों की जानकारी  के साथ-साथ निम्नलिखित प्रश्नों के भी कुछ-न-कुछ समाधान पायेंगे। जैसे कि- भगवान कृष्ण के अनुसार क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ क्या है? गीता उपदेश क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ, श्रीमद्भागवत गीता उपदेश, गीता उपदेश pdf, कृष्ण अर्जुन गीता उपदेश, गीता उपदेश महाभारत, श्रीमद्भागवत गीता उपदेश हिंदी में, वेदों में क्षेत्र क्षेत्रज्ञ की परिभाषा, क्षेत्र क्षेत्रज्ञ क्या है गीता के अनुसार, क्षेत्र क्षेत्रज्ञ की परिभाषा हिन्दी में, गीता के अनुसार क्षेत्र क्षेत्रज्ञ क्या है, भगवान कृष्ण के अनुसार क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ क्या है, आदि। इन प्रश्नों के उत्तर जानने के पहले, आइए !  भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन जी महाराज का दर्शन करें।  

इस अध्याय के पहले वाले अध्याय 12 "अथ् भक्तियोग"  को पढ़ने के लिए   यहां दबाएं।

श्रीमद्भागवतगीता के अनुसार शरीरी और शरीर की चर्चा, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के क्या है?
श्रीमद्भागवतगीता के अनुसार शरीर और शरीरी की चर्चा

भगवान कृष्ण के अनुसार Shareer aur shareeree kya

भगवान श्री कृष्ण कुरुक्षेत्र में अर्जुन से कहते हैं कि " शरीर को ' क्षेत्र ' कहते हैं और इसे जो जानता है , उसको तत्वज्ञानी लोग ' क्षेत्रज्ञ ' कहते हैं ।  इस तेरहवें अध्याय में क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ का विभाग करके उनके स्वरूपों का पृथक - पृथक वर्णन इसलिए किया गया है कि लोग शरीर ( क्षेत्र ) और शरीरी ( क्षेत्रज्ञ ) अर्थात् देह और देही को यथार्थतः भिन्न - भिन्न कर जानें - ....  "   इसे अच्छी तरह समझने के लिए इस अध्याय के मूल भावनाओं पर विस्तृत चर्चा करते हुए सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज लिखते हैं-

अध्याय १३

 अथ क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ विभागयोग

         इस अध्याय का विषय क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ विभागयोग है।

 इस अध्याय के आरम्भ में ही कह दिया गया है कि शरीर को ' क्षेत्र ' कहते हैं और इसे जो जानता है , उसको तत्वज्ञानी लोग ' क्षेत्रज्ञ ' कहते हैं । बारहवें अध्याय में भक्तियोग का वर्णन हो चुका है । अब इस तेरहवें अध्याय में क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ का विभाग करके उनके स्वरूपों का पृथक - पृथक वर्णन इसलिए किया गया है कि लोग शरीर ( क्षेत्र ) और शरीरी ( क्षेत्रज्ञ ) अर्थात् देह और देही को यथार्थतः भिन्न - भिन्न कर जानें - दोनों को एक ही न समझ बैंठें और न यह समझ कि देही देह ही है और न ऐसी भूल करें कि देह में देह से भिन्न कुछ अन्य पदार्थ ( देही या चेतन जीव ) है ही नहीं ; तथा लोगों की सुनिश्चित रूप से यह भी पूर्णतया विदित हो जाया कि स्वयं परमात्मा की विशेषावतार के शरीर ( क्षेत्र ) में उस व्यक्त दिव्य श्रीविग्रहरूप से भिन्न , अद्भुत और अव्यक्त हैं ।
   बारहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि अव्यक्तोपासक भी मुझे ही ( मामेव ) पाते हैं । क्या यहाँ ' मुझे ही ' ( मामेव ) कहकर श्रीभगवान अपने व्यक्त नर - शरीर को ही बतलाते हैं ? यदि इसका उत्तर ' हाँ ' हो , तो अव्यक्तोपासक भी व्यक्त रूप को ही पाते हैं - ऐसा कहा जाएगा । परन्तु यह उत्तर युक्तियुक्त और आँचनेयोग्य नहीं भगवान ने गीता में ऐसा कहीं नहीं कहा है कि मैं केवल व्यक्तरूप ही हूँ , अव्यक्त नहीं । बल्कि अध्याय ७ के श्लोक २४ में स्पष्ट रूप से उन्होंने अपने को अव्यक्त ही बतलाया है और केवल व्यक्त ही कहकर जाननेवालों को ' बुद्धिहीन ' कहा है । युक्तिसंगत बात तो यह है कि अव्यक्तोपासक अव्यक्त स्वरूप को ही अन्त में प्राप्त करे । अतएव बारहवें अध्याय में श्लोक ४ के ' मामेव ' ( मुझे ही ) से भगवान ने अपने अव्यक्त स्वरूप को ही व्यक्त किया है , ऐसा जानना चाहिए । अपने इस स्वरूप को भी क्षेत्र से स्पष्टतया भिन्न जानने की आवश्यकता जानकर ही उन्होंने इस अध्याय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विचार कहा है । 
     यदि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ - विभाग का ज्ञान लोग नहीं जानेंगे , तो केवल व्यक्त क्षेत्र - ज्ञान में पड़े रहेंगे ; अव्यक्त स्वरूप को नहीं जानकर अज्ञानता से नहीं छूटेंगे । क्षेत्र - क्षेत्र - विभाग - वर्णन में कहा गया है कि पाँच स्थूल तत्त्व ( मिट्टी , जल , अग्नि , वायु और आकाश ) , पाँच सूक्ष्म तत्त्व ( गन्ध , रस , रूप , स्पर्श और शब्द ) , अहंकार , बुद्धि , प्रकृति , दशेन्द्रियाँ ( हाथ , पैर , मुँह , गुदा और लिंग - ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और आँख , कान , नासिका , जिह्वा और त्वचा - ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ) , मन , चैतन्य , संघात ( कहे गये का संघरूप ) , धृति ( धारण करने की शक्ति ) और इनके विचार इच्छा , द्वेष , सुख और दुःख - इन इकतीस के समूह को संक्षेप में ' क्षेत्र ' कहते हैं । इस क्षेत्र के जाननेवाले को ' क्षेत्रज्ञ ' कहते हैं । गीता भगवती कहती है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के ज्ञान को ही ' ज्ञान ' कहते हैं ।
      सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ तत्त्व - रूप से परमात्मा ही हैं , यह भगवान श्रीकृष्ण का मत है ।
      श्रवण , मनन , निदिध्यासन तथा अनुभव से प्राप्त इस ज्ञान की पूर्णता के लिए मानहीनता , पाखण्डहीनता , अहिंसा , क्षमा , सरलता , गुरु - उपासना , पवित्रता , स्थिरता , अपने ऊपर रोक , इन्द्रियों के विषयों से मन का अलगाव , निरहंकारिता, जन्म , मरण , बुढ़ापा , व्याधि , दुःख और दोषों का सदा स्मरण , पुत्र , स्त्री , गृहादि में मोह तथा ममता का अभाव , प्रिय और अप्रिय में स्थिर समता , अनन्यता से ध्यानयुक्त परमात्मा की एकनिष्ठ भक्ति , एकान्त स्थान का सेवन , जनसमूह में सम्मिलित होने की अरुचि , अध्यात्म - ज्ञान की सत्यता का स्मरण और आत्म - दर्शन - इन सबका सेवन करता हुआ साधक ज्ञान में रहता है । यदि ऐसा नहीं रहता है , तो वह अज्ञान में है । इन सब बातों के सहित भगवान श्रीकृष्ण का यह भी मत है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के ज्ञान को ही ज्ञान कहते हैं और क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ तत्त्वतः परमात्मा ही हैं । अतएव उपर्युक्त ज्ञानों के अतिरिक्त ज्ञान को अनात्म - ज्ञान कहना अनुचित नहीं है । गीता में यह नहीं कहा गया है कि भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य नररूप वा विराट रूप श्रीविग्रहों वा दिव्य क्षेत्रों में और उनमें व्याप्त आत्मा* या क्षेत्रज्ञ में भेद नहीं है ।
      क्षेत्र को व्यक्त कहा जायेगा , परन्तु क्षेत्रज्ञ को व्यक्त नहीं , अव्यक्त कहा जायेगा । सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ तत्त्व - रूप से परमात्मा ही हैं , उसे प्रत्यक्ष जाननेवाले मोक्ष पाते हैं । वह अनादि पर - ब्रह्म हैं , उसे न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही ।
      परब्रह्म की सब ओर सब इन्द्रियाँ हैं ; परन्तु वे इन्द्रियों से रहित , अलिप्त और इन्द्रियातीत हैं । तात्पर्य यह कि परब्रह्म में सब ओर के सब प्रकार के ज्ञान सदा विद्यमान रहते हैं , वे सर्वव्यापक हैं । वे सबके बाहर और सबके अन्दर सदा विद्यमान रहते हैं । त्रयगुणों में रहते हुए अर्थात् उनका भोक्ता होते हुए भी वे उन गुणों से रहित हैं । अर्थात् निर्गुण हैं । वे स्थित होते भी गतिमान हैं । ( परा प्रकृति में व्यापक रहने के कारण ही गतिमान - सा दीखता है और परा प्रकृति में व्याप्त अर्थात् उस प्रकृति के सहित रहने के कारण उसे राम या सबमें रमण करनेवाला भी कहते हैं , यही सच्चिदानन्द है । ) यह ब्रह्म सबसे दूर और सबसे अधिक निकट भी है ।
 इस सम्बन्ध में कबीर साहब के ये शब्द हैं- "श्रूप अखंडित व्यापी चैतन्यश्चैतन्य । ऊँचे नीचे आगे पीछे दाहिन बायँ अनन्य । बड़ा तें बड़ा छोट तें छोटा मींहीं तें सब लेखा । सबके मध्य निरन्तर साईं दृष्टि दृष्टि सों देखा ।"  ''है सब में सब ही तें न्यारा .. सब के निकट दूर सब ही ते .........॥ ' 
"सखिया वा घर सबसे न्यारा , जहँ पूरन पुरुष हमारा । जहँ नहिं सुख - दुख साँच झूठ नहि , पाप न पुन्न पसारा ॥ नहिं निर्गुण नहिं सर्गुण भाई , नहीं सूक्ष्म स्थूल । नहिं अच्छर नहिं अविगत भाई , ये सब जग के मूलं ॥"
      सब अनकेताओं में वह पुरुषोत्तम परब्रह्म बँटा हुआ - सा दीखता है ; परन्तु सब अनेकताओं में रहकर भी वह अविभक्त , अखण्ड और एक - ही - एक रहता है । वह प्राण्यिों को कर्ता , पालक और नाशक है । वही अपरोक्षता से जानने योग्य है , अन्धकार से परे है और ज्योति की भी ज्योति अर्थात् ज्योति का भी प्रकाशक है । गीताजी कहती हैं कि इस अध्याय में वर्णित क्षेत्र , क्षेत्रज्ञ , ज्ञाता और ज्ञेय को जाननेवाला भक्त परमात्मा के भाव को ( अर्थात् व्यक्त और अव्यक्त भाव को ) पानेयोग्य बनता है ।
      प्रकृति और पुरुष ( अर्थात् जड़ और चेतन ) दोनों अनादि हैं । इसको इस प्रकार भी कह सकते हैं कि दोनों प्रकृतियाँ - त्रयगुणमयी अपरा और निर्गुण परा - वा क्षर पुरुष और अक्षर पुरुष - वा असत् और सत् - अनादि हैं । विकार और गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं । कार्य और कारण का हेतु ( कारण ) प्रकृति ( महाकारण ) है । कार्य ( अर्थात् अनेकतामयी सृष्टि ) का कारण साम्यावस्थाधारिणी मूल प्रकृति का कम्पित भागरूप विकृति प्रकृति है और इस कारण - रूप विकृति प्रकृति का हेतु या कारण साम्यावस्थाधारिणी त्रयगुणमयी मूल प्रकृति है । इसी मूल प्रकृति को ' महाकारण ' कह सकेंगे । जगत का यह उपादान कारण है । पुरुष - चेतन जीव , प्रकृति से उत्पन्न होनेवाले गुणों  को भोगता है , अतएव यह सुख - दुःख के भोग में कारण है । यही भोग और गुण का संग जीव के अच्छी - बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण होता है ।
      शरीरस्थ जीव अकेला ही शरीर में नहीं रहता है । परमात्मा पुरुषोत्तम भी उसके साथ -ही -साथ शरीर में इस प्रकार पूर्णतः व्याप्त रहता है , जिस प्रकार वायुपूर्ण किसी घट में आकाश । परा प्रकृति वा चेतन - जीव - पुरुष , पुरुषोत्तम परमात्मा से स्थूल दशा में है और स्थूल में सूक्ष्म स्वाभाविक ही व्याप्त रहता है । त्रयगुणमयी प्रकृति को तथा पुरुष को उपर्युक्त प्रकार से अपरोक्ष ज्ञान - द्वारा जो जानता है , वह कर्तव्य कर्मों को करता रहकर भी फिर जन्म नहीं पाता है ।
      कोई ध्यान द्वारा कोई सांख्य - योग अर्थात् सांख्य - शास्त्र से निरूपित ज्ञान में मन - बुद्धि को डुबाए रखकर और कोई कर्मयोग द्वारा योगस्थ रहकर अर्थात् कर्तव्य कर्मों को योगस्थ रहकर करता हुआ आत्मा - द्वारा आत्मा को देखता है , तात्पर्य यह कि चेतन आत्मा - द्वारा परमात्मा का दर्शन पाता है ।
      जो शास्त्र पढ़कर उपर्युक्त विषयों का ज्ञान नहीं रखते हैं , वे दूसरों से सुनकर श्रद्धा से परमात्मा का भजन करके संसार से तर जाते हैं । परमात्मा - ईश्वर को सर्वत्र समभाव से रहता हुआ जो मनुष्य देखता है , वह अपघाती नहीं बनता और परम गति पाता है । 
     सब कर्मों को करनेवाली प्रकृति है और आत्मा अकर्ता है । जो यह देखता है , वही यथार्थ देखता है । जीवों के भिन्नत्व में जब एकत्व दीखने लगे और सब फैलाव उसी एक में होने का बोध जब हो , तब परमात्मा - ब्रह्म की प्राप्ति होती है ।
     जैसे सर्वव्यापी आकाश को किसी का लेप नहीं लगता , वैसे ही सर्वव्यापी आत्मा को भी । जैसे एक ही सूर्य सर्वजगत को प्रकाशित करता है , वैसे ही क्षेत्रज्ञ सब क्षेत्रों को प्रकाशित करता है अर्थात् सचेतन करके रखता है । ज्ञान - चक्षु ( आत्मदृष्टि ) द्वारा क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ का भेद और जीव - आत्मा की मुक्ति की विधि को जो जानता है ( विधि - अनुकूल साधन करता है ) , वह ब्रह्म - परमात्मा को पाता है । ॥ त्रयोदश अध्याय समाप्त ॥

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* चैतन्य अपरिवर्तनशील , गतिशील और कल्पमय पदार्थ है , अतएव सत् परन्तु मर्यादित या ससीम है । यही जीवरूपा परा प्रकृति है । गीता , अध्याय ७ , श्लोक ५ और महाभारत , शान्तिपर्व , उत्तरार्द्ध , अध्याय १०४ में परा प्रकृति को रूपान्तर - दशा से रहित कहा गया है । जीव को जड़ नहीं माना जा सकता । इसको अक्षर पुरूष कहते हैं । अतएव चैतन्य सत्य है । क्षेत्र के ३१ तत्त्वों में एक चेतना अर्थात् चैतन्य भी है । जड़ असत् है । यही अपरा प्रकृति , क्षर पुरुष है । परमात्मा अक्षर अर्थात् सत् और क्षर अर्थात् असत् ; दोनों से उत्तम और परे हैं । इसलिए उस पुरुषोत्तम परमात्मा को न सत् कह सकते हैं और न असत् । वह अनादि , असीम अर्थात् अमर्यादित है , अतएव ध्रुव और अकम्प है । असीम के बाहर अवकाश नहीं । जिसके बाहर अवकाश नहीं , उसमे कम्प अथवा गति नहीं । असीम एक ही हो सकता है । चैतन्य स्वाभाविक ही गतिशील और कम्नमय है । यह ससीम है ।

      अपरा - जड़ प्रकृति ( रज , सत् और तम ) त्रयगुणमयी है । परा प्रकृति जयगुण - रहित है । परब्रह्म पुरुषोत्तम को दोनों प्रकृतियों से परे वा उत्तम होने के कारण निर्गुण और सगुण दोनों के परे भी कहा जाता है ।
      उस सच्चिदानन्द के यर्थाथ स्वरूप को बालगंगाधर तिलकजी ने इस तरह समझाया है - प्रकृति और पुरुष के परे भी जाकर उपनिषत्कारों ने यह सिद्धान्त स्थापित किया है कि सच्चिदानन्द ब्रह्म से भी श्रेष्ठ श्रेणी का ' निगुर्ण ब्रह्म ' ही जगत का मूल है ।
 
    इनके अनादित्व के विषय में गीता , अध्याय १४ , श्लोक ३ के वर्णन के स्थान पर पढ़िए ।

     अज्ञ का कहना है कि किसी गिलास में एक ही बार गिलास भर पानी और उतनी ही मदिरा नही अँट सकती , अतएव ईश्वर नहीं , केवल जीव ही देह में है ।
     ये तीनों पृथक् - पृथक् साधन जाने जाते हैं , परन्तु तीनों आपस में मिले - जुले रहते हैं और श्रद्धालु भक्त भी अपने भक्ति - साधन में इन तीनों से युक्त हो जाता है । इनके वर्णन के पृथक् - पृथक् अध्यायों में ये बातें समझा दी गई हैं ।

    ऐसा दर्शन केवल बौद्धिक या परोक्ष नहीं , बल्कि अपरोक्ष अर्थात प्रत्यक्ष होना चाहिए । ऐसा दर्शन तभी हो सकता है , जब चेतन आत्मा से परमात्मा का दर्शन हो ।

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इस अध्याय के बाद वाले अध्याय १४ को पढ़ने के लिए   यहां क्लिक करें।

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श्रीमद्भागवत गीता पर सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज द्वारा किया गया टीकाग्रंथ श्रीगीता-योग-प्रकाश
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