श्रीगीता-योग-प्रकाश / 16
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श्रीगीता-योग-प्रकाश
अध्याय 16
अथ दैवासुर - संपद्विभागयोग
इस अध्याय का विषय दैवासुरसंपद्विभागयोग है ।
अध्याय ९ में आसुरी और दैवी प्रकृति वालों का वर्णन समास रूप से देते हुए कहा है कि परम भावमय परमात्मस्वरूप को दैवी प्रकृति वाले पहचान सकते हैं ; परन्तु आसुरी प्रकृति वाले उसे नहीं पहचान सकते ।
उस परमात्म - स्वरूप पुरुषोत्तम का पहचानना अत्यन्त आवश्यक है ; क्योंकि उसके ही पहचानने से जीवों को मोक्ष प्राप्त होता है ।
अतएव यह बड़ी आवश्यकता हुई कि दैवी और आसुरी सम्पदाओं को विभागपूर्वक कुछ विस्तार से जनाया जाय , ताकि लोग अपने को आसुरी संपद् से निकालते और बचाते रहकर देवी संपद् में दृढ़ता से अपने को रखे रहें अर्थात् अध्याय १५ में कहे गये पुरुषोत्तम को प्राप्त करने के योग्य गुणों को वे यत्न से धारण कर सकें ।
दैवी सम्पदा- १ ) निर्भयता , ( २ ) अन्तःकरण को शुद्धता , ( ३ ) निष्ठा ( ज्ञान और योग में निरन्तर गाढ़ स्थिति ) , ( ४ ) दान , ( ५ ) इन्द्रिय - निग्रह , ( ६ ) यज्ञ ( लोक - उपकारार्थ कर्म ) , ( ७ ) अध्यात्म वाक्यों का पाठ , ( ८ तप , ( ९ ) सरलता , ( १० ) अहिंसा , ( ११ ) सत्य , ( १२ ) अक्रोध , ( १३ ) त्याग , ( १४ ) शान्ति , ( १५ ) अपिशुनता ( चुगली नहीं करनी ) , ( १६ ) दया , ( १७ ) इन्द्रिय - भोगों में लोभी नहीं होना , ( १८ ) कोमलहृदयता , ( १ ९ ) अयोग्य कर्म करने में लज्जा , (२० ) अचंचलता , ( २१ ) तेजस्विता , ( २२ ) क्षमा , ( २३ ) धृति अर्थात् धैर्य ( २४ ) शौच , ( २५ ) अद्रोह और ( २६ ) निरभिमानिता ; इन २६ आस्तिक बनते हैं , पर यथार्थतः वे ईश्वरवादी वा आस्तिक कहने योग्य गुणों को ' देवी सम्पत्ति ' कहते हैं । जिनमें ये हों , वे देवी सम्पत्ति वाले हैं ।
आसुरी सम्पदा- ( १ ) दम्भ , ( २ ) दर्प ( घमण्ड ) , ( ३ ) अभिमान ( ४ ) क्रोध , ( ५ ) निष्ठुरता या कड़ाई और ( ६ ) अज्ञान - ये छः दुर्गुण आसुरी सम्पद् के हैं । ये जिनमें हैं , वे आसुरी सम्पद् के मनुष्य हैं । अथवा यह कहना अनुचित नहीं होगा कि दैवी सम्पत्ति के उलटे लक्षण सब आसुरी सम्पत्ति के हैं ।
दैवी सम्पद् मोक्षदायक और आसुरी सम्पद् बन्धन करने वाले हैं । इस लोक में दो प्रकार के लोग होते हैं - दैवी और आसुरी । म प्रवृत्ति क्या है , निवृत्ति क्या है , आसुरी लक्षणवाले यह नहीं जानते । उन्हें पवित्रता और सदाचारिता ज्ञात नहीं होती और री न वे सत्य का ही आदर करते हैं । वे कहते हैं- " जगत् असत्य , निराधार और ईश्वर* रहित है । जीव - सृष्टि केवल स्त्री - पुरुष के संयोग से हुई है । उसमें विषय ही भोगना कर्त्तव्य है । " ये भयानक काम करने वाले मतिमन्द - जगत् के शत्र - दुष्टगण इस अभिप्राय को पकड़े हुए संसार - मर्यादा के नाश के लिये बढ़ते हैं । ये तृप्त न होने वाली कामनाओं से भरपूर , पाखण्डी , मानी , मदान्ध , अशुभ निश्चय वाले , मोहवश दुष्ट इच्छाएं ग्रहण करके संसार में फंसे रहते हैं । संसार - प्रलय तक अन्त नहीं होने वाली , नाप - जोख से हीन चिन्ताओं का सहारा लेकर , कामों के अत्यन्त भोगी , " भोग ही सर्वस्व है ' ऐसा निश्चय वाले , अनेक आशाओं के जाल में फंसे हुए कामी , क्रोधी , विषय - भोग के लिये अन्याय से धन - संग्रह करना चाहते हैं । इनकी इच्छाएं बहुत होती हैं , ये अपने को श्रीमान् , सिद्ध , बलवान् और कुलीन मानते हैं । अपने समान किसी दूसरे को नहीं मानते हैं । मैं यज्ञ करूंगा , दान करूंगा , आनन्द करूँगा , एक शत्रु को तो मारा , अब दूसरे को भी मारूंगा - मूढत्व दशा में आसूरी सम्पत्ति के लोग ऐसा मानते हैं । ये मोह - जाल में फँस , विषय - भोग में मस्त , अशुभ नरक में गार पड़ते हैं । इन नीच , द्वषी , क्र र , अधम नरों को परमात्मा अत्यन्त आसुरी योनियों में बारम्बार डालते हैं । परमात्मा को नहीं पाकर ये और भी अधम गति को प्राप्त होते हैं ।
काम , क्रोध और लोभ - ये नरक के तीन द्वार हैं । अतएव । मनुष्य को चाहिये कि इन्हे त्याग आत्मा को ये तीनों अत्यन्त वभ हानि में डालते हैं । परन्तु इन तीनों से दूर रहने वाला मनुष्योती आत्मा के कल्याण का आचरण करता है और परम गति को पाता है ।
सद्ग्रन्थों में कही गयी विधियों को छोड़कर जो मनमाना और करने लगता है , वह विषय - भोगों में डूबता है । इस तरह वह यंत्र न सिद्धि पाता है , न सुख पाता है और न परम गति पाता है अतएव सद्ग्रन्थों द्वारा निर्णीत कर्त्तव्य कर्मों को जानकर कम करना चाहिये ।
।। षोडश अध्याय समाप्त । ।
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* जो एक सर्वव्यापी और सर्वपर ईश्वर नहीं मानते , बल्कि प्रत्येक शरीरस्थ जीवात्मा को अर्थात् भिन्न - भिन्न असंख्य शरीरों की आत्मा को , अनेक जानते हुए , उन्हीं अनेक को पृथक् - पृथक् अनेकता में रह सारी सृष्टि में फैल कर रहने को ही , उनकी सर्वव्यापकता बतलाकर उन अनेक को ही ईश्वर मानते हैं , वे सर्वसाधारण की दृष्टि में ईश्वरवादी अर्थात् ण ५ ) म . २१ ) ता नहीं जा नहीं है - नास्तिक हैं । ईश्वर एक ही होना चाहिये , अनेक नहीं ।
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