G08, श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार मरते समय क्या करना चाहिए ।। ShriGita-Yog-Prakash 8th Chapter - SatsangdhyanGeeta

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G08, श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार मरते समय क्या करना चाहिए ।। ShriGita-Yog-Prakash 8th Chapter

श्रीगीता-योग-प्रकाश / 08 

प्रभु प्रेमियों ! भारत ही नहीं, वरंच विश्व-विख्यात सुविख्यात श्रीमद्भागवत गीता भगवान श्री कृष्ण द्वारा गाया हुआ गीत है। इसमें 700 श्लोक हैं तथा सब मिलाकर 9456 शब्द हैं। इतने शब्दों की यह तेजस्विनी पुस्तिका भारत की आध्यात्म-विद्या की सबसे बड़ी देन है। संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) पुस्तक "श्रीगीता-योग-प्रकाश" इसी पुस्तिका के बारे में फैले हुए सैकड़ों भ्रामक विचारों को दूर करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें सभी श्लोकों के अर्थ और उनकी टीका नहीं है। गीता के सही तात्पर्य को समझने के लिए जो दृष्टिकोण, साधनानुभूति-जन्य ज्ञान, संतवाणीी-सम्मत और गुरु ज्ञान से मेल खाते वचन चाहिए, वही इसमें दर्शाया गया है।

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अक्षर ब्रह्म योग क्या है?

According to Shrimad Bhagwat Geeta what to do while dying

इसमें बताया गया है कि अक्षरब्रह्मयोग क्या है? अध्यात्म किसे कहते हैं? कर्म किसे कहते हैं? अधिभूत किसे कहते हैं? अधिदैव क्या है? यज्ञों के अधिपति कौन है? जीवन मुक्त कौन हो सकता है? परम पुरुष को कौन पाता है? ब्रह्मा का 1 दिन और रात कितने समय का होता है? परमात्मा का परम धाम क्या है? उत्तरायण और दक्षिणायन क्या है? उत्तरायण और दक्षिणायन के प्रभाव से कौन बचता है? मरने के समय क्या करें, जिससे परमात्मा की प्राप्ति हो जाए। मृत्यु सबकी होगी। लेकिन जो मोक्षार्थी हैं । मोक्ष की इच्छा वाले हैं, जो सभी दुखों से छूटना चाहते हैं। वह अक्षर ब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति करना चाहते हैं। ऐसे पुरुषों को जीवन भर ऐसा क्या करना चाहिए, जिससे मरने के समय वह अक्षरब्रह्म परमात्मा को स्मरण करते हुए शरीर छोड़े। इन बातों की चर्चा इस अध्याय में किया गया है। इसके साथ ही आप निम्नांकिचत सवालों के जवाबों में से भी कुछ-न-कुछ समाधान अवश्य पाएंगे। जैसे- मरने से पहले क्या, मनुष्य की मृत्यु कब होगी, मौत के बाद कितने समय तक हमारा हृदय जीवित रह सकता है, मरते समय क्या करना चाहिए, मरने से पहले के लक्षण, आदमी मरते समय क्या सोचता है, समय से पहले मौत हो जाना, मरने के बाद क्या होता है, अकाल मृत्यु के बाद क्या होता है, क्या मौत पहले से ही निश्चित होती है, मरने से पहले क्या दिखाई देता है, मरते वक्त क्या होता है, श्रीमद्भगवद्गीता,मौत के संकेत,अब मौत है,मृत्यु के समय क्या होता है,आत्मा को कितने दिन में दूसरा शरीर मिलता है, इंसान के मरते समय,क्या भगवान/खुदा है?तो कहां है,मरने के बाद क्या होता है,विज्ञान कहता है यह होता है मरने के बाद, आत्मा और परमात्मा की सच्ची कहानियां, मृत्यू से पूर्व प्राणों का त्याग करते समय ओ३म् उच्चारण,मरने के बाद की जिंदगी,मृत्यु के बाद का सत्य, मृत्यु के समय क्या होता है, मौत आने से पहले क्या होता है, मरने के बाद आदमी कहां जाता है, मृत्यु रहस्य मरने के बाद आत्मा कहां जाती है, मौत के बाद का रहस्य, आदि बातें। इत्यादि बातें । इन बातों को समझने के लिए  आइए उनकेे विचार पढ़ते हैं-

अध्याय 8

अथ अक्षरब्रह्मयोग

इस अध्याय में परमाक्षर* ( सर्वव्यापी ब्रह्म परमात्मा ) का वर्णन है ।

     शरीरोपाधि - सहित अनाशी आत्मतत्त्व से जो उच्च है अर्थात् जो शरीरोपाधि से रहित है , उस परमाक्षर ( श्रेष्ठतम अविनाशी ) को ब्रह्म कहते हैं । शरीरोपाधि - सहित शरीर - निवासी आत्मा को अध्यात्म कहते हैं । प्राणियों को उत्पन्न करने के व्यापार को कर्म कहते हैं । नाशवान रूपों को अधिभूत कहते हैं । नाशवानों में रहनेवाला चेतनात्मक पुरुष अधिदैव है और सब यज्ञों के अधिपति सर्वव्यापी परमात्मा ही हैं । जो परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर - त्याग करता है , वह उनमें जा मिलता है । जीवनकाल में सदा जो जिस ख्याल में लगा रहता है , मृत्युकाल में भी उसी ख्याल में लगा हुआ , वह उसी का स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है और उसी में जा मिलता है । मृत्युकाल बड़ा ही विकट कष्ट का होता है । इसमें अचेत हो जाना स्वाभाविक है । परमात्म - प्राप्ति का गहरा प्रेम और उसमें तन - मन से मग्न रहकर , जीवन भर ध्यान - योग - द्वारा जो उनकी उपासना करता रहेगा , वही उस कठिन काल में भी परमात्मा को भजता हुआ शरीर - त्याग कर सकेगा । जो सर्वदा अपने मन और बुद्धि को परमात्मा में लगाये रहकर अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करता रहेगा , अथवा ' तन काम में , मन राम में ' **   वा    ' पलटू कारज सब करे , सुरत रहै अलगान । ' का साधन करता रहेगा और एकान्त ही होकर नित्य नियमित रूप से भी ध्यानाभ्यास करता रहेगा , वह अन्त में अवश्य ही जीवन्मुक्त होगा और और परमात्मा से जा मिलेगा । जो जिसका सदा स्मरण करता है और देह - त्याग के काल में उसी में अपने को लगाये रहकर शरीर त्यागता है , वह उसमें जा मिलता है ।

     चित्तवृत्ति के निरोध का अभ्यास करके उसे दूसरी ओर न जाने देकर जो परमात्मा की ओर एकाग्र होता है , वह दिव्य परम पुरुष को पाता है । सर्वज्ञ , पुरातन , शासक , पालक , अणु से भी छोटा और सूर्य - सदृश ज्योतिर्मय ( ज्योतिर्मय विन्दु ) परम पुरुष के रूप को भक्तियुक्त होकर और योगबल से अपने प्राण ( चेतना - संवित् - सुरत ) को अपने भौंओं के बीच में स्थिर रखकर दर्शन करता हुआ , अपने शरीर से चलने के समय या मृत्यु के समय जो डूबा रहता है , वह उस परम पुरुष को पाता है । [ मरण - काल में ऐसा उसको नहीं हो सकता , जो केवल कर्मयोग करे और छठे अध्याय में बतायी हुई विधि से ध्यानयोग के सहित ( इस अध्याय के श्लोक ७ में वर्णित रूप से ) कर्मयोग का जीवनभर साधन न करता रहे । इस अध्याय के श्लोक ७ में कथित कर्मयोग ही सब प्रकार के कर्मयोगों में उत्तत है । इसके अतिरिक्त दूसरे सबको ऐसा कहना - ' सो सब करम धरम जरि जाऊ । जहँ न राम पदपंकज भाऊ ॥ ' ( गो ० तुलसीदासजी ) अनुचित नहीं होगा । ]

     इस अध्याय के श्लोक ३ में जिस परमाक्षर ब्रह्म ( परमात्मा ) का बखान वेदविद् ( ज्ञानवान ) करते हैं और विरक्त लोग जिसकी प्राप्ति की इच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं , उसकी प्राप्ति का साधन यह है कि इन्द्रियों के सब द्वारों को रोककर , मन को हृदय ( योगहृदय ) में स्थिर करके और प्राण को मस्तक में समेटकर समाधिस्थ हो अर्थात् तुरीयावस्था में अपने को लाकर ॐ शब्दब्रह्म का भजन करे ।

     इस प्रकार भजन करता हुआ जो योगी शरीर त्यागता है , वह परमाक्षर को पाकर परम गति अर्थात् ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करता है । इस गति की आकांक्षा रखनेवालों को नित्य निरन्तर परमात्मदेव का भजन कर , नित्ययुक्त योगी होना चाहिए । तब वह उस परमात्मदेव को पावेगा । वह दुःखमय नाशवान संसार को त्यागकर , जन्म - मरण के चक्र को पार कर जाएगा ।

     ब्रह्मलोक - सहित सब लोक बनते और नाश होते रहते हैं । ब्रह्मा का एक दिन एक हजार युगों का और उतने ही समय की उसकी एक रात होती है । उस दिन अव्यक्त प्रकृति से यह व्यक्त सृष्टि बनती है और रात होने पर वह सृष्टि नष्ट होकर अव्यक्त में लीन हो जाती है । इस अव्यक्त प्रकृति से परे दूसरा अव्यक्त भाव और भी है । सबके नाश होने पर भी जिसका नाश नहीं होता है और जिसको पाकर प्राणी का जन्म नहीं होता है , वही परमात्मा का परम धाम है । 

     इस अध्याय में यह भी कहा गया है कि उत्तरायण के अन्दर के छह मास के शुक्लपक्ष में , दिन के समय जबकि अग्नि की ज्वाला उठ रही हो , उस समय जिस ब्रह्मज्ञानी की मृत्यु हो , वह ब्रह्म को पाता है और दक्षिणायन के छह मास के कृष्णपक्ष में , जब रात्रि के समय धुआँ फैला हुआ हो , उस समय मरनेवाला चन्द्रलोक को पाकर पुनर्जन्म पाता है । परन्तु पूर्व कही गई विधि से जीवन बिताकर मृत्यु के समय पूर्व कथनानुसार जो प्राण स्थापित रखेगा , उस पर उत्तरायण और दक्षिणायन का कोई प्रभाव नहीं हो सकेगा । वह पूर्वलिखित गति को अवश्य प्राप्त करेगा । हाँ ! यदि उत्तरायण को ऊपर ∆  के छह स्थान [ ( १ ) सहस्रदल कमल , ( २ ) त्रिकुटी , ( ३ ) शून्य , ( ४ ) महाशून्य ( ५ ) भँवरगुफा और ( ६ ) सत्यलोक ] मान लें , दिन और प्रकाश को अन्तर्योति मानें तथा नीचे ¶  के छह चक्रों [ ( १ ) आज्ञा , ( २ ) विशुद्ध , ( ३ ) अनाहत , ( ४ ) मणिपूरक , ( ५ ) स्वाधिष्ठान और ( ६ ) मूलाधार ] को दक्षिणायन मान लें , तो पूर्व कथनानुसार शरीर त्यागनेवाले की गति में मेल मिल जायेगा । भीष्म पितामह ने बहुत कष्ट सहन कर उत्तरायण में शरीर छोड़ा था , परन्तु ब्रह्म के पास न जाकर वसुओं के निवासस्थान देवलोकवाले स्वर्ग में गये । 

॥ अष्टम अध्याय समाप्त ।।


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 * इस अध्याय के श्लोक ३ में ' परमाक्षर ब्रह्म ' वर्णित हुआ है । 

** इस अध्याय के श्लोक ७ का भावार्थ यही है । 

∆ भूमण्डल का चित्र देखें - ऊपर उत्तर और नीचे दक्षिण । 

¶ वसुभिः सहितं पश्य भीष्मं शान्तनवं नृपम् । ( महाभारत , स्वर्गारोहण पर्व , अ ०४ , श्लोक २१ ) भावार्थ - राजा शान्तनु के पुत्र भीष्म पितामह को वस्सुओं के साथ देखो । वसूनेव महातेजा भीष्मः प्राप महाद्युतिः । अष्टावेवहि दृश्यन्ते वसवो भरतवर्षभ । ( महाभारत , स्वर्गारोहण पर्व , अ ०५ , श्लोक ११-१२ भावार्थ - महातेजस्वी बड़े पराक्रमी भीष्मजी वसुओं में लीन हो गये । श्रीमद्भगवद्गीता ' महाभारत ' का एक अति छोटा , परन्तु महातेजस्वी अंश है । अतएव महाभारत से इसका मेल अवश्य मिलन चाहिए । 

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प्रेमियों ! आप लोगों ने गुरु महाराज कृत "श्री गीता योग प्रकाश" के तीसरे अध्याय में जाना कि marane se pahale kya, manushy kee mrtyu kab hogee, maut ke baad kitane samay tak hamaara hrday jeevit rah sakata hai, marate samay kya karana chaahie, marane se pahale ke lakshan, aadamee marate samay kya sochata hai, samay se pahale maut ho jaana, marane ke baad kya hota hai, akaal mrtyu ke baad kya hota hai, kya maut pahale se hee nishchit hotee hai, marane se pahale kya dikhaee deta hai, marate vakt kya hota hai,  इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका याक्ष कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने  इससे आपको आने वाले पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। इस लेख का पाठ निम्न वीडियो में किया गया है । इसे अवश्य  देखें।



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G08, श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार मरते समय क्या करना चाहिए ।। ShriGita-Yog-Prakash 8th Chapter G08, श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार मरते समय क्या करना चाहिए ।।  ShriGita-Yog-Prakash 8th Chapter Reviewed by सत्संग ध्यान on 7/16/2018 Rating: 5

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