G02, (ख) What is the numerical sum of Shrimad Bhagwat Geeta - सद्गुरु महर्षि मेंही - SatsangdhyanGeeta

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G02, (ख) What is the numerical sum of Shrimad Bhagwat Geeta - सद्गुरु महर्षि मेंही

श्री गीता योग प्रकाश / 2 (ख)

प्रभु प्रेमियों !  श्रीमद्भागवत गीता की महिमा में बताया गया है कि "जो मनुष्य शुद्धचित्त होकर प्रेमपूर्वक इस पवित्र गीताशास्त्रका पाठ करता है, वह भय और शोक आदिसे रहित होकर विष्णुधामको प्राप्त कर लेता है॥"  "जो मनुष्य शुद्धचित्त होकर प्रेमपूर्वक इस पवित्र गीताशास्त्रका पाठ करता है, वह भय और शोक आदिसे रहित होकर विष्णुधामको प्राप्त कर लेता है॥१॥" "जो मनुष्य सदा गीताका पाठ करनेवाला है तथा प्राणायाममें तत्पर रहता है, उसके इस जन्म और पूर्वजन्ममें किये हुए समस्त पाप नि:सन्देह नष्ट हो जाते हैं॥२॥"  इस तरह की बहुत सारी बातें गीता महिमा के अनुकूल है। परंतु इसकी वास्तविक जानकारी किसी योगी महापुरुष की वाणी से ही निश्चित होती है। 

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज द्वारा रचित "श्री गीता योग प्रकाश" के अध्याय 2 के दूसरे भाग में हम लोग जानेंगे- श्रीमद्भागवत गीता का सांख्य योग क्या है? श्रीमद्भागवत गीता के सांख्ययोग विषयक चर्चा का शेष भाग ।

इसके प्रथम भााग को पढ़ने के लििए     यहां दबाएं।  

What is the numerical sum of Shrimad Bhagwat Geeta - सद्गुरु महर्षि मेंही

What is the numerical sum of Shrimad Bhagwat Geeta

Bhagwat Geeta Chapter 2,  श्रीमद भगवद गीता: अध्याय २ - सांख्य योग,हिंदी साहित्य मार्गदर्शन में गीता ज्ञान का यथारूप, भगवत गीता सार, श्री कृष्ण भगवतगीता ज्ञान, सांख्य योग का क्या अर्थ है,गीता में योग का स्वरूप,श्रीमद्भागवत गीता में सांख्य योग के बारे में क्या बताया गया है? इसे सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के जो विचार हैं उसे पढ़ते हैं-

अथ सांख्ययोग- योग के आरम्भ का नाश नहीं होता है । * इस धर्म का किंचित् मात्र पालन भी महाभय से बचाता है और इसका आश्रय ग्रहण करने से कर्म - बन्धन टूटता है । योगी की बुद्धि निश्चयात्मक , स्थिर और सम होती है । केवल कर्म करने में ही जीवों का अधिकार है , फल - प्राप्ति में कदापि नहीं । स्वर्ग , भोग , ऐश्वर्य और कर्म - फल - प्राप्ति की इच्छा तथा वेद की त्रय गुणविषयक अभिलाषाओं से रहित होकर त्रय गुणातीत बनो । दुःख - सुख आदि द्वन्द्वों से अलिप्त होओ । नित्य सत्य वस्तुओं में स्थित रहो । वस्तुओं के पाने और उन्हें सँभालने की झंझट से मुक्त रहो और आत्म - परायण बनो । समत्व वा समता पाने का अभ्यास करो । समत्व को ही योग कहते हैं और कर्म करने के कौशल वा चतुराई को भी योग कहते हैं । समत्व बुद्धि की अपेक्षा केवल कर्म बहुत ही तुच्छ है । अनेक वेद - वाक्यों में उलझी वा घबड़ायी हुई बुद्धि जब समाधि वा ध्यान में स्थिर वा निश्चल होगी , तब समत्व वा समता प्राप्त होगी । जब सब कामनाएँ छूटती हैं , आत्मा - द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहा जाता है , तब बुद्धि की स्थिरता वा स्थितप्रज्ञता आती है । इतना सुन अर्जुन ने भगवान से पूछा कि स्थितप्रज्ञ के क्या लक्षण हैं तथा वह किस प्रकार बोलता , बैठता और चलता है ? स्थितप्रज्ञ के बोलने , बैठने और चलने के विषय में किए गये प्रश्नों का कुछ भी उत्तर न देकर भगवान ने उसके ये लक्षण बतलाए कि वह कामनाओं का त्यागी , आत्मा - द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहनेवाला , सांसारिक दुःख - सुख से दुःखी - सुखी न होनेवाला , मनोविकारों से रहित और स्थिर बुद्धिवाला होता है । जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने खोखले में समेट लेता है , उसी भाँति जो इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है अर्थात् इन्द्रियों के अन्दर की चेतन - धारों वा सुरत की धारों को उनके केन्द्र में समेट लेता है , वह स्थितप्रज्ञ वा स्थिर बुद्धिवाला होता है । ** यदि कोई भोजन छोड़े और उपवासी होकर रहे , तो विषयों की ओर से उसकी इन्द्रियों की गति मन्द पड़ती है । परन्तु विषय - रस की स्मृति और उसकी इच्छा नहीं छूटती है । ये तो परब्रह्म परमात्मा वा सर्वेश्वर के ही दर्शन से छूटती हैं । *** विषय - चिन्तन से आसक्ति , आसक्ति से काम , काम से क्रोध , क्रोध से मूढ़ता , मूढ़ता से अचेतता और इससे ज्ञान का नाश हो जाता है । ज्ञान नष्ट हुआ मनुष्य मृतक के तुल्य है । वह समता - विहीन , विवेकहीन और भक्तिरिक्त होता है । भक्ति - बिना शान्ति नहीं और शान्ति - बिना सुख कहाँ ? जिस मनुष्य में सांसारिक भोग शान्त हो जाते हैं , सारी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं , ममता और अहंकार त्यागकर जो विचरण करता है , वही शान्ति पाता है । भजनाभ्यासी संयमी , भोगियों के जगकर विलास करने के समय सोता है और भोगियों के सोने के समय जगकर भजनाभ्यास करता है । पूर्ववर्णित शान्ति - प्राप्त पुरुष की स्थिति ब्राह्मी स्थिति है अर्थात् परम प्रभु परमात्मा को पाकर जीवन - मुक्ति में रहने की दशा है । इसे पा जाने पर कोई मोह में नहीं फंसता है । ∆ मृत्युकाल में भी इसी दशा में रहता हुआ शरीर त्यागकर , वह परब्रह्म परमात्मा में लय होता है और ब्रह्म - निर्वाण उसे प्राप्त होता है । इस अध्याय के उपदेशों का सार थोड़े शब्दों में यह है कि प्रथम श्रवण और मनन द्वारा आत्म - ज्ञान या सांख्य - ज्ञान प्राप्त करो । उस ज्ञान में अपने को रखते हुए सांसारिक कार्यों को अलिप्तता से वा कर्म - फल में अनासक्त रहते हुए करते रहो तथा समाधि - योगयुक्त परमात्म - भक्ति का अभ्यास करके ब्रह्म - साक्षात्कार , ब्राह्मी स्थिति , जीवन - मुक्ति , शान्ति और ब्रह्म - निर्वाण प्राप्त करके मोहों से छूटकर संसार के कर्तव्य कर्म करो । 1 ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥


*योगहीनं कथं ज्ञानं मोक्षदं भवतीह भोः । योगोऽपि ज्ञानहीनस्तु न क्षमो मोक्षकर्मणि । तस्माज्ज्ञानं च योगं च मुमुक्षुर्दृढमभ्यसेत् ॥ ( योगशिखोपनिषद् )
अर्थ - योगहीन ज्ञान मोक्षप्रद भला कैसे हो सकता है ? उसी तरह ज्ञान - रहित योग भी मोक्ष - कार्य में समथ नहीं हो सकता । इसलिए ज्ञान और योग , दोनों का अभ्यास दृढ़ता के साथ मुमुक्षु को करना चाहिए । और , गो ० तुलसीदासजी ने भी कहा है चौ ० - धर्म ते विरति योग ते ज्ञाना । ज्ञान मोक्षप्रद वेद बखाना ।। " योगारम्भ - रूप संस्कार जबसे अभ्यासी के अन्दर बीज - रूप से पड़ जाता है , तबसे वह उसके साथ तबतक वर्तमान रहता है , जबतक अभ्यासी को मोक्ष और परम शान्ति न मिल जाय । इसका स्पष्टीकरण . छठे अध्याय में अच्छी तरह किया गया है ।

** इन्द्रियों में बिखरी चेतनधारों का केन्द्र आज्ञाचक्र का केन्द्र - विन्दु है । इन्द्रियों से चेतनधारों के हटने से इन्द्रियाँ विषयों में नहीं जा सकेंगी - विषयों से समेटी जाएँगी । केवल विचार - ही - विचार से यह सिमटाव नहीं होगा । इस अध्याय के श्लोक ५३ और ५४ में समाधि वा ध्यान की बात कही गई है । इसके अभ्यास से वर्णित सिमटाव होता है ।

*** अर्जुन को व्यक्त रूप भगवान का दर्शन और उनका गहरा संग तो था ही ; परन्तु उसकी विषय - भोग की इच्छा नहीं छूटी थी । ( महाभारत की कथाएँ पढ़कर देखिए ) सांख्य दर्शन चित्र 5

  ∆ अर्जुन को व्यक्त रूप भगवान प्राप्त ही थे , फिर भी वह मोह में फंसा । भगवान ने उसे मोह छुड़ाने का उपदेश दिया । सांख्यदर्शन व्याख्या समाप्त।


इस अध्याय के बाद वाले अध्याय को पढ़ने के लिए


     प्रभु प्रेमियों ! आप लोगों ने जाना सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज द्वारा रचित श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय में सांख्यदर्शन संबंधित जानकारी प्राप्त की ।हम आशा करते हैं कि श्री गीतायोग की सांख्यदर्शन ज्ञान की पूरी जानकारी आपको हो गई होगी । गीता से संबंधित कई तरह के भ्रामक विचारों को दूर करने के लिए ही गुरु महाराज ने श्रीगीता जो प्रकाश लिखा है। जो उनके अनुभव ज्ञान से युक्त है। उपर्युक्तत लेख को सुननेेेेेे देखने के लिए यहां क्लिक करें


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G02, (ख) What is the numerical sum of Shrimad Bhagwat Geeta - सद्गुरु महर्षि मेंही


G02, (ख) What is the numerical sum of Shrimad Bhagwat Geeta - सद्गुरु महर्षि मेंही G02, (ख) What is the numerical sum of Shrimad Bhagwat Geeta - सद्गुरु महर्षि मेंही Reviewed by सत्संग ध्यान on 6/16/2020 Rating: 5

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